बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

प्रेरणादायक

अनुभव -
कुछ दिन पहले मैं डॉक्टर के केबिन के बाहर अपने बुलाये जाने की प्रतीक्षा कर रही थी। मुझसे पहले ही एक बुजुर्ग महिला भी प्रतीक्षा कर रही थी। यूँ ही सामान्य सी बातें चल निकलीं उस से। वह उस डॉक्टर की तारीफ कर रही थी कि यह बहुत ही अच्छी डॉक्टर है। वह पहले कई बार आ चुकी थी, मैं पहली बार गई थी उसके पास।
बातों बातों में उसने बताया कि वह 80 साल की है। सुनकर मुझे हैरानी हुई, क्योंकि वह अधिकतम पैंसठ- छासठ साल की स्वस्थ, सक्षम और सजग महिला लग रही थी। मैंने कहा आप अस्सी साल के नहीं लगते हो, किस तरह इतना सुडौल और खूबसूरत बनाये रखा है खुद को? उसने कहा मैं खूब ध्यान रखती हूँ अपना। खूब पानी पीती हूँ और रोज़ ताजा बना खाना खाती हूँ। पैदल करने जाती हूँ और घर के काम भी करती हूँ। आगे उसने कहा आजकल लोग बहुत जल्दी अपनी त्वचा ख़राब कर बैठते हैं और उनके पास समय भी नहीं अपना ध्यान रखने का। मैं उनकी बात से सहमत थी।
प्रेरणादायक बात यह कि एक अस्सी वर्ष की महिला, खुश और तारो ताजा दिखती बुजुर्ग स्त्री स्वयं ही निपट अकेली हॉस्पिटल आई थी, वो भी लोकल बस में। किसी तरह की कोई शिकायत नहीं कि पति साथ नहीं आया और ना ही बच्चों से कोई उम्मीद कि वे उसके साथ आएंगे।
उस से बात करके मुझे महसूस हुआ जवान बने रहने का एक राज़ यह भी है कि स्वयं को सक्षम बनाया जाए और जहां तक संभव हो किसी और के भरोसे न रहा जाए। किसी का मोहताज होना अर्थात स्वयं को कमजोर करना। जबकि स्वयं पहल करके अपने काम करना अर्थात स्वयं को मजबूत बनाना, अपने आप को शक्ति प्रदान करना। फिर चाहे कोई भी उम्र हो आप सदैव स्वावलम्बी रहेंगे, खुश प्रसन्न रहेंगे।

एक पाती

एक पाती आती है,
मैं आकाश चूमना चाहता हूँ,
आभासी है आकाश, महसूस होने से परे
मैं धरती चूम लेता हूँ.

एक पाती आती है,
मैं नदी को गले लगाना चाहता हूँ,
चुलबुली है नदी, रूकती नहीं कहीं,
मैं पत्नी से लिपट जाता हूँ.

एक पाती आती है,
मैं घने वृक्ष सा झूमना चाहता हूँ,
झड चुके हैं पत्ते,
मैं बच्चों को निकटतम खींच लेता हूँ,
फिर करता हूँ प्रतीक्षा,
और एक पाती आये...!


कविता हूँ मैं

तुम्हारी किताब में  लिखी हुई, 
बेअंत नज़्म हूँ मैं,
तुम्हारे शब्दों में कही गई, 
आँखों में ठहरी हूँ मैं ,
तुम्हारे ख्वाब में पली हुई ,
हज़ार रंगों की कविता हूँ मैं .
यूँ पढ़ना मुझे तुम, कि मेरे 
सारे रंग तुम में समा जायें।



राही

कई प्रकाशवर्षों से 
चल रहा हूँ 
काफ़िला साथ लिये 
किसी और रौशनी में 
मेरी मंज़िल 
निहित होगी 
कि राह चुकती नहीं 
चाह थकती नहीं 
ख़ानाबदोश है आह 
वक़्त ज़रुरत 
मेरा साथ देती नहीं



मौला

मैंने उड़ान भरी
पंछियों की तरह 
मैंने नृत्य किया 
सूफ़ियों की तरह 
मेरी देह 
मिट्टी की हुई 
उड़ी,
लचकी,
ढह गई


*****************

मैं सजदा करूँ,
मुझे थाम लेना मौला
मैं बिछड़ जाऊँ,
मुझे खोज लेना मौला
मैं भूलूँ,
तुम न भूलने देना
मेरा चेहरा,
तेरी ही पहचान मौला।


******************

तू ही रंग 
तू ही बेरंग 
तुझसे प्रेम 
तुझसे ही जंग 
मैं इक परछाई 
बेनूर 

तेरे बिन मौला 
आ, रंग मुझे
तेरे रंग मौला 
इस वजूद को 
जलवा दे मौला 



ईश्वर

मैं प्रेम पूरित
मैं करुणचित्त
तुम नित्य मेरी
ममता जनित
सब और से
स्नेह निहित
तुम बूझ लो
यह सर्वविदित।

कहानी में लड़का 3

 -3 - स्त्री देह में

मुंडेर पर पाँव झूलाता है, सामने
देखता है झूले पर उमगती लड़की
बचपन से सीखा था उसने,
लड़के पतंग उड़ाते हैं
कबड्डी खेलते हैं
तैर कर नदी पार जाते हैं,

झूला लडकियां झूलती हैं,
श्रृंगार के लिए आइना देखती हैं
हंसी ठिठोली में शाम नष्ट करती हैं
तब से झूले पर नहीं बैठा वो
हैरानी होती उसे कि
उसके भीतर कोई स्त्री तत्त्व नहीं रहता!!
जो कुछ था वो क्यों बस पुरुषत्व था?
स्त्री पुरुष का अलगाव उसे बुरा लगता
धारणाओं में बदलाव चाहता था
चाहता था कि उसकी बावरी  
खेतों में उसके साथ दौड़े
तैर कर नदी पार चले
चाहता था कि बावरी के झूले में
वह भी सवार हो चाँद छू ले
कल्पनाओं में कई बार
घेरदार घाघरा चुनर ओढ़
बावरी सा घूमर नृत्य किया उसने
आईने के आगे काजल पहना
माथे पर टिकुली सजाई
कई बार बढ़ाई झूले पर पेंग,
कई बार सेकी बाजरी की रोटी
अपने हाथों से खिलाई प्याज संग
अपनी रूपमती स्त्री को, उसके
पग पखार पंखा झलता रहा
तभी खेत से गुजरती हुई
माँ सामने आ खड़ी हुई उसके
कल्पनाएँ हलकी थी, हवा हुई
माँ के आगे नज़र न उठा पाया
झेंप कर मुंडेर से गिर पड़ा वो
बावरी ने लपक कर थामा
खुद लोट गई उसके पाँव तले
माटी सनी उसकी देह
पुरुषत्व को लगी बल देने.


कहानी में लड़का 2

 -2 - याद गली 
  
वह छत पर उडाता है पतंग 
दौड़ता है रेल की पटरियों पर 
खींचता हैडोर पतंग की तन जाती है 
थम जाती है रेलदिखती है 
खिड़की के पार दादी माँ 
सुबह सवेरे कराती है मंजन 
खिलाती है चाय में डूबा जीरा टोस्ट 
पीछे आते हैं दादाजी 
झक्क सफ़ेद दूध का गिलास उठाये 
ठीक उतना ही गर्म
जिस से न जीभ जले न दिल
उसकी पतंग उड़ान भरती है 
रुक जाती हवा में ही माँ के प्रवेश से 
नहलाकर यूनिफॉर्म पहनाती है माँ 
बुआ खिलाती है दही परांठे का नाश्ता 
सब विदा करते हैं,
स्कूल पहुंचाते हैं पिता 
शाम को लेने आते हैं चाचा 
फिर चल पड़ती है थमी रेल 
समय के अबूझ रथ पर 
हवा में मचल उठती है पतंग 
कसने लगता है मांझा 
पेंच लड़ाता है वो,
चांदनी की छत पर 
(बचपन में उसे चाँद पुकारता था)
देखता था उसके पारभासी कंठ से 
किस तरह उतरता था पानी 
फिर आईने के सामने पिया किया पानी 
अपारदर्शी नेक बोन हिलती 
हंस पड़ता वो 
कुदरत के दोगलेपन पर 
लहू उभर आया है डोर थामे हुए 
उसकी रेल ठहरी प्रथम स्पर्श पर 
झुरझुरी ने हवा दी 
लालायित किया छूने को 
एक बल खाती है पतंग  
आकाश चूमती है 
दौड़ पड़ती है वेगवान रेल 
दोनों पटरियों पर टिकी 
लड़का गिनता है रेल के डिब्बे 
रेल वही हैपटरी वही 
डिब्बों की  संख्या 
बदल जाती है 
हर बार, पतंग नए रंग की. 

कहानी में लड़का 1


-1- आहट

वह लड़का जो उस राह पर
रोज़ करता था प्रतीक्षा,
एक दिन बेचैनी ओढ़
आया तोप सा दनदनाता हुआ और
उड़ेल दिया अपना दिल लड़की को रोक कर।

प्रणय निवेदन से पहले
हज़ार बार लाखों बार
उसने टटोला खुद को, 
धड़कते दिल को थम जाने की ताकीद की 
गुस्साया खुद पर
झल्लाया मन ही मन इस स्वीकृति पर
रोकना चाहा प्रेम को खुद ही तक।

इस सारे गुस्से, झल्लाहट और संकीर्णता से परे
मन की उद्दात लहरों पर
उसने खोजी एक राह उम्मीद की,
दिन भर कवायद के बाद भी
नई ऊर्जा से दमकते हुये
प्रेम में थिरकने का जज़्बा जगाया उसने।

किये कई नाराज़ पल स्वाहा
बस एक प्रेम अनुभूति जीने की चाह में
वो मुस्काया हर उस उदास पल में
जब अचानक खवाबों की तस्वीर ने 
किया जेहन पर कब्ज़ा
जब चूमा उसने अपनी प्रिया को
नशे में या होश में,
जब ऊँगली में फँसी सिगरेट की जलन से याद आया उसे कि
अभी आलिंगन का सुख पेंडिंग है।

हसरतें छलक जाने के पल में,
जब मचल मचल रोया उसका किशोर मन
और ख़यालों में लड़की को समर्पित प्रेम
पुनः पा लेने का हौसला
उसके कंधों पर तमगा बन झिलमिलाया, 
तब आवेग में
किया उसने प्रेम निवेदन,
बिना यह जाने 
कि लड़की ने हज़ार बरस पहले 
उसके आने की आहट 
बंद पलकों पर रखे 
प्रेम के फाहों से सुन ली थी। 

आराध्य

मेरे आराध्य तुम
तुम आराधो मुझे
एक ही तत्त्व शक्ति
एक ही तत्त्व शिव
सर्वत्र सर्वत्र सर्वत्र

समर्पित

मेरे नेत्रों की ज्योति
तेरी राह करे जगमग
मेरे हाथों की लकीरें
तुझे रहें संभाले पग पग
इस धरा गगन में बन्दे
भरा प्रेम हर कण कण
ज़रा शीश झुका कर देखो
मैं तुझे समर्पित प्रति क्षण !

गैरहाजिर


याद नहीं आता मेरी  
कौनसी कविता में 
पहली बार प्रेम आया होगा 
यह भी नहीं स्मृति में 
कि  प्रेम शब्द रूप  में आया 
या भाव रूप में? 

संभव है यह भी कि 
प्रत्येक कविता में 
प्रेम लिखा हो 
कभी रोष की तरह 
कभी स्नेह की तरह 

यह भी अनुकूल है कि 
किसी ने पढ़ कर प्रेम 
अनुभव किया होगा 
किसी ने प्रेम 
उपेक्षित किया होगा 

सुदूर बलते दिये की 
लौ सा है मेरा प्रेम 
चाहो सुगन्धित हो लेना 
चाहो अवहेलना कर लेना 
सम्भाव्य यही अटल कि 
अबोध प्रेम की आंच 
तुम तक पहुंचेगी अवश्य।

मत रोना

देखो, बारिशों में कभी मत रोना
भीगेगी देह भी
भीगेगी रूह भी 
तब धूप भी न होगी 
कि मन की नमी सोख ले!
और सुनो, मत रोना गर्मियों में 
आंसूं और पसीना 
एक से दिखेंगे 
कोई आँख में छिपी 
दर्द की लकीर 
पकड़ ही न पायेगा।
बहुत मन करे तो रो लेना 
पतझड़ में 
किसी डाल से गिरते 
सूखे पत्ते पर गिरा देना 
अपना एक आंसूं 
जी उठेगा वो 
नवजीवन की आस में।

अंतिम स्पर्श

सोचती हूँ 
स्वयं को एक तस्वीर में ढाल  
दोहरा जीवन जी लूँ !

अक्सर ऐसा होता आया है 
लोग मांग लेते हैं तस्वीर 
अपने कमरे सजाने के लिए 
या दिल के खेल खेलने के लिए 
कभी कभी तो सिर्फ अपने 
कम्प्यूटर स्क्रीन सजाने के लिए 
एक तरह से आदत भी है मुझे 
तस्वीर में मुस्कुराने की 
कोई देखेगा तो 
अजनबी नहीं लगेगी मेरी तस्वीर 

सोचती हूँ 
इनकार नहीं करुँगी किसी को 
जब कोई चूमना चाहेगा मेरी तस्वीर 
अपनी वासना में भरपूर 
ना ही रोकूंगी 
किसी के प्रेम का आवेश 
जब मेरे सामने स्वीकार करेगा वो 
यूँ भी तो मैं नहीं जानती 
जाने कितनी बार उसने 
अपनी भड़ास निकाली होगी मुझ पर !
जाने कितनी बार अपने जेहन में 
किया होगा 
किसी ने मेरा बलात्कार ! 

सोचती हूँ 
एक रोज़ 
मैं पत्थर सी हो जाउंगी 
दिल से, दिमाग से ,

कठोर ऐसी कि किसी 
कोमल छुअन से भी 
रहूं अविचलित ,
भंगुर भी ऐसी कि 
घन हथौड़े केआघात से 

खंड खंड जाऊं बिखर !

उस रोज़ तुम आना और 
मेरी राख समुन्दर के हवाले कर देना 
मैं याद रखूंगी 
बस वही अंतिम और पावन स्पर्श!

आराधना

जीवन जैसे जैसे समाप्ति की और अग्रसर हो रहा था, 
जीने का लगाव और गहरा हो रहा था।
देखा हुआ और अधिक देखने की 
उत्कंठा बढ़ रही थी।  
भोगा हुआ और अधिक भोगने का 
भ्रम बना हुआ था।  
चाहा हुआ और अधिक चाहने का 
लालच विस्तृत हो रहा था। 
अधूरी  कामनाएं रोकने का हर प्रयास 
विफल हुआ जा रहा था। 
लालसा, इच्छा, वासना शरीर का गुण था जीव का नहीं, 
फिर भी इस से बच निकलना 
किसी  तरह संभव न था।  
जीव और अधिक जीवन चाहता था अथवा मुक्ति, यह तो वही जाने, 
लेकिन काया स्वयं को जर्जर होते देख कर भी 
जीने का गुमान  बनाये हुए थी।
हे मृत्यु देव, तुम्हारी आराधना संभव नहीं !
और 
जीवन की आराधना के लिए कोई देव उपस्थित नहीं। 

लेन देन

कोई सुबह धूम धूम 
दस्तक देता है
और शाम ढले 
छोड़ जाता है सूनापन
जैसे बरसाती नदी 
झूम कर उमड़ पड़ती है
अचानक 
और सूख जाती है 
अचानक

कितना रुलाता है 
बातों का सूख जाना
कितना उदास है 
प्रतीक्षा का टूट जाना
और 
जाने कितनी निराशा लपेटे है
प्रेम का लेन देन 

याद

हमें जेहन में रख लो 
पनीली याद सा
या ज़ुबां पर रख लो 
अचारी स्वाद सा
कभी ज़िक्र करोगे हमारा
तो इनायतें बरसेंगी तुम पे 

निर्बंध


कभी भविष्य में और कभी अतीत में 
जीने की विवशता से 
मुक्ति पाना आसान नहीं होता
पर  समय की इस तेज धारा में
मैं ' आज'  और ' अभी'  के 
संयोग से मिले
'
इसी पल''  में जी रही हूँ
मैं देख रही हूँ हर ' एक क्षण'  को
अपने सामने ' मचलते हुये'
और उसी पल
फिसल कर ' चले जाते हुये'
जब तक लिखती हूँ ' यह´ शब्द
इसकी जगह ले लेता है नया कोई शब्द,
और मैं इस बार आने देती हूँ
प्रत्येक नवीन शब्द को 
अपनी स्वतंत्र गति से,
मेरे विचारों की
बनावट से मुक्त,
मेरे पुरानेपन की
संवेदनाओं से भी मुक्त।
ठीक वैसा ही जैसा
होना चाहिए एक नहर को
जैसे होना चाहिए आकाश को
जैसा होना चाहिए जीवन को...
हाँ... ठीक वैसा ही
निर्बंध..
मुक्त हरअतीत'  और ' भविष्य'  से।