निश्छल, सरल, मासूम प्यार की तस्वीर तुमको दिखलाऊं,
पर राधा- कान्हा के प्रेम को सशरीर कहाँ से ले आऊं??
मैं कहूं, सांस की उर्जा में , कुदरत का प्यार समाया है,
तुम साँसों के जरिये प्यार जताने, निकट चले आते हो...
मैं कहूं, मुस्काती आँखों में , ईश्वर ने प्यार बसाया है,
तुम कहो, जाम का प्याला इन्हें, पीने को ललचाते हो...
मैं चाहूं शाश्वत सत्य सा प्यार, मेरी प्रार्थना है खामोशी,
तुम रूप की पूजा करने वाले, क्षणिक मिलन से पाओ ख़ुशी....
विकसित इस मस्तिष्क पटल में, भोलापन कैसे लाऊँ???
यदि तुम बालक बन जाओ, तुम्हे प्यार का मतलब समझाऊं ...
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बहुत बढ़िया... मैंने भी इस विषय पर लिखा था, पर मेरी सोच और नजरिया थोडा-सा अलग था...
ReplyDeleteबहुत प्यारी-सी रचना...
विकसित इस मस्तिष्क पटल में, भोलापन कैसे लाऊँ???
ReplyDeleteयदि तुम बालक बन जाओ, तुम्हे प्यार का मतलब समझाऊं ...
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यह कविता तो अद्भुत है!
बहुत बढ़िया...
ReplyDeletebahut achhi kavita... bahut-bahut badhai...
ReplyDeleteएक शे'र याद आया है बार बार ..कविता को पढ़कर..
ReplyDeleteखुदा जब पूछ बैठा वो इबादत क्या हुई तेरी
कहा अब दिल में शायद आ बसा है आपसा कोई...
सान्सारिक प्रेम और ईश्वरीय प्रेम...दोनों को शायद तौलती सी कविता...या शायद ना भी तौलती सी..
पर बहुत अच्छी लगी...कमेन्ट करने में काफी वक़्त लगा...
:)
:)
धन्यवाद पूजा जी,
ReplyDeleteआपकी रचना पढ़ना चाहूंगी .
बहुत बहुत धन्यवाद शास्त्री जी.
ReplyDeleteशुक्रिया आना .
ReplyDeleteआभार बिमलेश,
ReplyDeleteबहुत अच्छा लगा कि आपने कमेन्ट लिखा.
मनु जी,
ReplyDeleteकविता का विश्लेषण करके आप मुझे हमेशा नया दृष्टिकोण देते हैं. बहुत बहुत बहुत धन्यवाद :)
मैं चाहूं शाश्वत सत्य सा प्यार, मेरी प्रार्थना है खामोशी,
ReplyDeleteतुम रूप की पूजा करने वाले, क्षणिक मिलन से पाओ ख़ुशी..
अद्भुत ..
"माया महा ठगिनी हम जानी"
कबीर की तरह निश्चल तुम्हारी पंक्तियाँ ...
देर लगी आने में हमको शुक्र है,फिर भी आये तो ....(सॉरी फॉर लेट टिप्पणी)
शुक्रिया नीलम जी,
ReplyDeleteदेरी की कोई बात नहीं, मुझे ख़ुशी है कि आपने पढ़ा, कमेन्ट लिखा :)
khoobsurat..touching
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