सुबह की पहली किरण को
सबसे पहले पकड़ लेने के मनसूबे लिये
पर्वतों के कदम छोटे करने में व्यस्त हो रही हूँ .....
तितलियों के पंखों को
उन किरणों की चमक से
रोशन करने की चाहत लिये
बगीचे के फूलों को अपनी बातों से फुसला रही हूँ.....
और इस चमक से
नूरानी हुये मेरे चेहरे पर अठखेलियाँ करती हंसी,
कहीं ठहरने की हसरत लिये
किरणों, फूलों और तितलियों संग
कुछ कुछ आवारापन कर रही है.
Sunday, December 5, 2010
Subscribe to:
Post Comments (Atom)


बगीचे के फूलों को अपनी बातों से फुसला रही हूँ.....
ReplyDeleteयह पंक्ति दिमाग पर असर करती है सुंदर रचना
सुन्दर रचना. टाइपिंग में एक गलती हो गयी है, उसे सुधर लें. "चहरे"
ReplyDeleteखूबसूरत
ReplyDeleteबस ये अवारागर्दी चलती रहे ............ सुभानअल्लाह .
ReplyDeletewah-2 kya likha hai aapnai.......kitni manmohak awaaragadi hai:P... keep it up band mat karnaa...:) bahuut pyaari lagi mujhe:)
ReplyDeletebahut khoobsoorat kavitaa...
ReplyDeletebahut hi eemaandaar khayaalon ke saath.....
kaash...!!!
ham abhi hindi mein likh paate...!
waah... bahut pyari
ReplyDeleteकुछ-कुछ आवारा पन का जवाब नहीं।...प्यारी कविता।
ReplyDelete