शुक्रवार, 15 अक्तूबर 2010

विदाई

शब्दों को शक्लें नहीं दिखती
शब्द तो बस एहसास होते हैं.
तुम थी तो शब्द मचलते थे इस घर में
तुम नहीं तो मौन बिखरा है यहाँ ...!!!

कभी कभी तुम्हारे शब्द ,
गूंजते हैं मेरे कानों में,
और.... मेरे कदम चल देते हैं,
उन्हें चुन कर दिल भर लेने को ...
पर यहाँ...
बिखरी मिलती है ख़ामोशी....!!!

तुम्हारे कमरे में
तुम्हारी तस्वीर से
बतियाती हूँ मैं
पूछती हूँ तुमसे, "क्या अपनी ससुराल में भी यूँ ही चंचल रहती हो तुम?"
तब हथेली पर महसूसती हूँ कुछ नन्ही धडकनें
और....
समझ नहीं पाती कि ये तुम्हारे आंसूं हैं या मेरे...!!!

12 टिप्‍पणियां:

  1. सभी ही अच्छे शब्दों का चयन
    और
    अपनी सवेदनाओ को अच्छी अभिव्यक्ति दी है आपने.

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  2. वाह..............क्या ख़्यालात हैं ......... बहुत सुन्दर..........

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  3. ओह ! एक माँ की पीडा का सुन्दर चित्रण बेहद सहजता से कर दिया।

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  4. धन्यवाद संजय जी,
    शुभकामनाएं .

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  5. बहुत बहुत धन्यवाद डॉ. शास्त्री जी|

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  6. शुक्रिया वंदना जी,
    माँ बेटी का रिश्ता ही कुछ ऐसा होता है...!!!

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  7. लाजवाब ...!!!

    पूछती हूँ तुमसे..' क्या अपनी ससुराल में भी यूं ही चचल रहती हो...?

    और समझ नहीं पाती ...कि ये मेरे आंसू हैं या तुम्हारे....!!!

    शादीशुदा बेटी की माँ के ख्यालों को खूब जबान दी है आपने...

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  8. लाजवाब ...!!!

    पूछती हूँ तुमसे..' क्या अपनी ससुराल में भी यूं ही चचल रहती हो...?

    और समझ नहीं पाती ...कि ये मेरे आंसू हैं या तुम्हारे....!!!

    शादीशुदा बेटी की माँ के ख्यालों को खूब जबान दी है आपने...

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  9. achi kavitaa likhi gayi hai ... bahuut badiyaa......kya aapko apni shaadi ki vidaayi.....ki yaad aa gayi thiiii:)........likhte raho:) keep it up:)

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  10. शुक्रिया मनु जी,
    बस एक छोटी सी कोशिश है...|

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  11. कुछ ऐसा ही समझो क्षितिज, धन्यवाद.

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