शुक्रवार, 29 मई 2020

अनुभूतियाँ 

साथ चलना आसान न था

हम एक दूसरे को अनुभव करते हुए 

कुछ दूर तक साथ चले 

आखिरी बार उस शांत झील किनारे 

हमने अपने आंसुओं से सुख लिखा 

और 

बिछड़ कर एक दूसरे की याद में रहने लगे 

धूप और छाँव की तरह 

अपनी अनुभूतियों का आना जाना 

तरंग दर तरंग देखा हमने 

और 

देखा यह कि हमारा साथ कितना सुखद था! 

जीवन में पीछे छूटा हुआ सुख 

आगे आने का वादा कहाँ करता है! 

जीवन लेकिन अपनी ही गति से चलता है।  

तुम थे तो तुम्हारे नाद से मेरी सुबहें जागीं 

तुम नहीं हो तो तुम्हारे ही मौन से 

मेरी सांझ को रंग मिलता है। 
 
मन के कितने मौसम बदल गए 

लहरों की तरह हम बन बन कर मिट गए।  

विदाई वाला अँधेरा जाता नहीं मन से, 

सुनो, अब यादों से भी विदा कर दो न!  

-पूजानिल 

16 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा सोमवार (01जून 2020) को 'ख़बरों की भरमार' (चर्चा अंक 3719 ) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    *****
    रवीन्द्र सिंह यादव

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर।
    पत्रकारिता दिवस की बधाई हो।

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत ही खूबसूरत सृजन.
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  4. आदरणीया पूजा अनिल जी, बहुत सुन्दर भावों से भरी रचना ! आपने विम्ब भी बहुत अच्छे सजाये हैं ! हार्दिक साधुवाद ! --ब्रजेन्द्र नाथ

    जवाब देंहटाएं
  5. अनुभव साथ का या यादों का ... जब तक उनकी हैं ... क्या एक ही बात नहीं ... बहुत गहरी रचना है ...

    जवाब देंहटाएं
  6. Bhut khub bhut khub

    https://designerdeekeshsahu.blogspot.com/?m=1

    जवाब देंहटाएं
  7. https://www.google.com/url?q=https://ajourneytoheart.blogspot.com/%3Fm%3D1&sa=U&ved=2ahUKEwiz--G19u3rAhX4zjgGHWuUC7gQFjAAegQIBBAB&usg=AOvVaw2K33FXeyHkGdScv2S_Eu0O

    जवाब देंहटाएं