Wednesday, July 29, 2009

मृत्यु

घनघोर अंधेरे में
खो सी गयी थी कहीं ,
बैचेन आँखे
थक कर
सो ही गयीं थी यहीं .

राह सूझती ना थी कोई ,
सफर का साथी नहीं कोई .

अकेले कहाँ तक ले जाती
ये हमदर्द राहें !!!

तभी नज़र आई
इक
किरण उजाले की ,

उसे थाम लेने की देर थी बस....
पर,
इंतज़ार ,
किसी और को
था मेरा ,

मेरे गुजर जाने की देर थी बस ....
छंट गया सारा
अँधेरा !!!

5 comments:

  1. एक बारगी पढ़ते ही लगा के........
    कुछ कह नहीं पाऊंगा शायद.......
    और अब भी क्या कहा...
    ,,,,

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  2. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. atii sundar.......... achai vichaar hain..... par itna andheraa..... ye achi baat nahi hai...........:):)

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  4. मेरे गुजर जाने की देर थी बस ....
    छंट गया सारा.........

    jeene ki baat kiyaa kijiye poojaa ji...

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