सोमवार, 20 सितंबर 2010

अन्तर्द्वन्द

रुके हुए सारे ख़याल ,
मौन की मुखरता को
चित्त की चंचलता को ,
और मन् की एकाग्रता को ,
पानी का सा प्रवाह देते रहे ,

कशमकश
ध्वनि और स्वर की चलती रही ,
ना दुःख जीता
ना सुख हारा
अन्तर्द्वन्द समेटे रहा निशा को,
हर नयी भोर, नयी संध्या,
नयी चुनौती देते रहे.

4 टिप्‍पणियां:

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  2. bahuut hi badiyaa mumaa........yeh jindagi hi ek jung hai .. jeet haar sukh dukh ek sikai ke do pehlu hain.. isliyai hameshaa khush rehna chahaiye .. bahuut hi badiya rachna hai aapki :) keep smiling :)

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