Friday, April 30, 2010

एकांत

दीवारें (अनधिकृत परेशानियाँ ) शोर करें और उन्हें शांत होने को ना कह सकें, ऐसा एकांत अपने ही वजूद में गहरे... और गहरे घाव करता जाता है.
अध्यात्म की दुनिया से विवेचनाओं की कुछ बूंद अमृत प्राप्त करने को सिसकता मन दिमाग के बंद दरवाजों पर दस्तक देते हार जाता है और मस्तिस्क एक जिद्दी बालक सा हठ लिये अपने अस्तित्व को खोजने नहीं देता. हार और समर्पण एक दूसरे के पूरक लगने लगते हैं. जीतने से भी विवेक लौट तो नहीं आता !!!!





कहीं पास ही किसी मधुर गीत के स्वर अचानक आमंत्रित करते हैं (शायद किसी का मोबाइल है) और मन चल पड़ता है उन स्वर लहरियों के भ्रमित मायाजाल की ओर..... इस मोह जनित भटकाव को ईश्वर की लीला कह कर झूठे सुकून से मन को बहलाया जाता है और अपने निश्चित लक्ष्य को भूल, भटकी राहों पर उठे क़दमों को दोबारा वास्तविकता की ओर मोड़ लाने का संकल्प मन को याद आ जाता है. पर भावनाओं के गहरे भंवर से लौटना इतना आसान तो नहीं होता................!!!!!

6 comments:

  1. सार्थक पोस्ट सिर्फ ध्यान से ही मायाजाल टूट सकता है.."

    ReplyDelete
  2. ... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

    ReplyDelete
  3. bahut sundar adhyatm ki raah kathin hai par durlabh nahi...

    ReplyDelete
  4. wallllllllllllaaahhh kya likh dala hai .sirf aur sirf mahsoos kar rahe hain .hmaare liye likha hai kya ,very nice, hindi me likhne ke liye dobara phir aaayenge .

    god bless u

    ReplyDelete