बुधवार, 14 अप्रैल 2010

परछाईयों का शहर 4 (अंतिम भाग)

गतांक से आगे....

"रामधारी ले चलो इन्हें पूछ ताछ के लिये."
"येस सर."
पुलिस के साथ उन तीनों की पूछताछ चल रही है.
"ड्रग्स का तस्करी में पकड़ा गया है तुम लोगों को .... मालूम है ना कितना बड़ा जुर्म होता है ये?"
तीनों गर्दन झुकाए अपनी आने वाली मुश्किल का ताना बना बुन रहे हैं. उनसे वो सवाल पूछा जा रहा है, जिसका जवाब उन्हें पता ही नहीं है. उन्हें तो यह भी नहीं पता कि कपडे में ड्रग्स कहाँ से आया!!! तस्करी तो बड़ी दूर की बात है, तीनों ने कभी ड्रग्स की शक्ल भी नहीं देखी.

"देखो, तुम तीनों अब तक दुनिया में खड़े होना भी नहीं सीखे हो... कोई तुम्हारा नाजायज़ फायदा उठा कर बच रहा है और तुम पकडे गये हो, अब अगर यहाँ से बच कर जाना चाहते हो तो सीधे सीधे बता दो कि तुम किसके लिये काम करते हो?"
"साहब, बताया ना कि हम रविन सर के लिये काम करता है...."
"फिर झूठ!!!!! ऐसा नाम का कोई आदमी है ही नहीं."
"तुम तीनों भले घर के दिखते हो, क्यों बेफालतू के लफड़े में पड़ते हो, तुम सिर्फ अपने मालिक का नाम बता दो, आगे हम देख लेंगे.समझाओ भाई ... कोई समझाओ इनको"
"हम सच बोलता है साहब..." मनीष खुद को एकदम असहाय पाता है, उसे कुछ सूझ नहीं रहा कि क्या करे, कैसे समझाए!!!
"साहब, आपको मांगता तो हम फिर से अपना ऑफिस ले चलता है ना आपको."
"ऑफिस ले चलेगा!!! उधर ना कोई तुझे पहचानता है ना तू किसी को पहचानता है.... हाँ!! चल, ले चल ना !!! (इंस्पेक्टर उन्हें चिड़ाते हुये बोलता है) अब तो लगता है तुम लोग इसी जेल की चारदीवारी में परमानेन्ट बसने वाले हो. क्यों भाई आराम से तो हो ना? तुम्हारे वास्ते खटिया मंगाये दूं?"
"गला सूख रहा है साहब, थोडा पानी मिलेगा?"
"पानी पीना है....हाँ मिलेगा ना, जरूर मिलेगा... हवलदार, इन साहब को पानी चाहिए, जाओ ले आओ पानी."
हवलदार पानी लाता है, इंस्पेक्टर मनीष के चेहरे पर पानी फेंकता है, "क्यों इतना पानी बहुत है या और मंगवाऊं?
"हमें छोड़ दो साहब, हम सच कह रहे हैं, हमने कुछ नहीं किया.... आई!! देवा!! बचाओ!!!"
"अब तुम्हे भगवान् याद आ रहे हैं, जब ऐसा गन्दा काम करते हो तब भगवान् याद नहीं आते? हाँ??"
"अब कैसे बतायें तुम्हे साहब, हमने कुछ नहीं किया...हमने कुछ नहीं किया...हमने कुछ नहीं किया." मनीष रोता है.
"हवलदार, यह ऐसे नहीं मानेगा, एक बाल्टी पानी और ले आओ."
"क्या हुआ रे मनुआ? क्यों चिल्ला रहा है?" मनीष को अपनी आई की आवाज़ सुनाई देती है.
"आई!! तू आ गई आई!!! देख आई देख, तेरे मनु को कैसे सता रहे हैं यह पुलिस वाले!!!"
इंस्पेक्टर फिर से उस पर पानी फेंकता है, मनीष रोता है और चिल्लाता है,"आईइ इ इ इ इ !!!"
"अरे चल उठ मनुआ!!! कब तक नींद में चिल्लाता रहेगा!!!"
मनीष हडबड़ाहट में उठता है, "आई! आई!!! यह तू है? इतना पानी डालने की क्या जरूरत थी आई?"
"साहब, साहब, हम कुछ नहीं किया साहब!.... अरे तू नींद में ऐसा बड़बड़ाता रहेगा तो तेरेको कैसे जगाये कोई!!!" आई खिलखिलाकर हंस पड़ती है.
"क्या आई!! तू ना कभी बच्चों से भी छोटी बन जाती है. मैं सीरियस सपना देख रहा था और तू हंस रही है? मालूम तेरे को, सपने में पुलिस पकड़ कर ले गई मेरे को, मेरी तो हालात हीच खराब होने को थी, वो तो देवा बचाया मेरेको... नहीं नहीं...आई, तुने बचा लिया आज."
"हाय देवा!!! मनुआ, तू ठीक तो है रे?
"हाँ आई! अब्बी ठीक है मैं, पन थोड़ी देर पहले ऐसा लगा कि गया अपुन तो काम से." मनीष आँखें झपकाते हुये फिर से अपने कमरे को और सामने खड़ी आई को देख कर खुद को आश्वस्त करता है कि अब सब ठीक है.
"क्या क्या सोचता रहता है रे तू! देवा है ना तेरे साथ... कुछ नहीं होने देगा तेरेको."
"हाँ आई, तेरा आशीर्वाद भी तो है.... तब्बी तो इधर तक पहुंचा है."
"चल, अब देर ना कर, तैयार हो जा, तेरा साहब आता होगा, मालूम ना समय का अंग्रेज है वो."
"हाँ आई, तू डब्बा बना, मैं अभी आया ."

समाप्त.


6 टिप्‍पणियां: