Wednesday, April 7, 2010

परछाईयों का शहर 3

इसके पहले -

गतांक से आगे......

5 महीने बाद

मनीष और उसके साथी शिपमेंट उतार रहे हैं, कुछ कस्टम ऑफिसर वहाँ पर चेकिंग के लिये आये हैं, मनीष के 3 साथी तत्काल भाग जाते हैं, मनीष और उसके दो साथियों से ऑफिसर जांच पड़ताल करते हैं.
"क्या हो रहा है यहाँ?"
"माल उतार रहे हैं साहब."
"तुम्हारे साथी भाग क्यों गये?"
"पता नहीं साहब... कोई लफड़ा किया रहेगा..."
"अच्छा दिखाओ, क्या है माल में !!!"
"कपड़ा है साहब..."
"खोलो ज़रा, देखें कैसा कपड़ा है?"
"रामधारी, चेक करो यह सामान"
"यस सर"
.....
" सर, इसमें यह कोकीन बरामद हुआ है.."
"क्यों बे!!! तुम तो कह रहे थे कि कपड़ा है, एक तो सरकार की आँखों में धूल झोंकते हो, और ऊपर से झूठ भी बोलते हो, रामधारी ... लगाओ इन सब को हथकड़ी और ले चलो हमारे ऑफिस ."
"साहब , हमारा कोई कसूर नहीं, हम तो बस सामान उतारते हैं, यह तो कम्पनी वालों का सामान है, आप कहो तो हमारे साहब से बात करवा दें."
"अब बात- वात थाने पहुँच कर ही होगी."
"हम सच कह रहे हैं साहब, हमारा कोई दोष नहीं, हमें तो पता भी नहीं साहब कि इसमें कोकीन है..."
"बस्स्स... चुप रहो. ज्यादा बक बक मत करो."
"साहब , सुन तो लो हमारी बात..."
"रामधारी, यह माल ज़ब्त कर लो और इन्हें ले चलो ."
उन तीनों को ड्रग्स तस्करी के अभियोग पर गिरफ्तार कर थाने ले जाते हैं .
"सर, एक बार हमारे ऑफिस बात कर लेने दीजिये.... प्लीज़."
" हाँ सर, तब आपको भी यकीन हो जायेगा कि इसमें हमारा कोई दोष नहीं ...प्लीज़ सर."
"यह भी ठीक है, रामधारी, गाडी इनके ऑफिस ले चलो, वहीँ पता चल जायेगा कि मामला क्या है..."
"तुम्हारे ऑफिस का पता बताओ...."
"फेब्रिक एन फेब्रिक कम्पनी........."
******
सब लोग फेब्रिक एन फेब्रिक कंपनी पहुँचते हैं, मनीष और उसके साथियों को लेकर ऑफिसर अन्दर दाखिल होता है.
" हेल्प डेस्क की लड़की अनजान लग रही है, शायद कोई नई लड़की है, दूसरे डिपार्टमेंट्स के लोग भी अनजान लग रहे हैं , जाने सब लोग कौन हैं???"- एक साथी आश्चर्य से कहता है.
"हाँ, यहाँ तो सब चेहरे अनजान लग रहे हैं...!!!!!"
"चलो रविन सर के लिये पूछते हैं..." मनीष सुझाव देता है .
"मैडम, रविन सर से बात करनी है."
"हू आर यू? एंड हू इस रविन? व्हाट डू यू वांट ?"
" मैं मनीष हूँ और इस कम्पनी में रविन सर ने काम दिलाया था, आप शायद नई हैं और उन्हें नहीं जानती."
"व्हाट!!! इ हेव बीन वर्किंग हियर सिन्स पास्ट एट ईयर्स, इ हेव नेवर सीन यू बीफोर एंड मोर ओवर नो वन नेम्ड रविन वर्क्स हियर .एनी थिंग एल्स ?"
"रामधारी, ले चलो इन तीनों को, यह लोग हमारा समय नष्ट करने के लिये किसी गलत जगह पर ले आये हैं."
"नहीं साहब, हम सच कह रहे हैं , यही हमारा ऑफिस है, रोज़ का आना जाना होता है यहाँ हमारा..."
" अच्छा, रोज़ यहाँ आते हो... तब किसी को तो पहचानते होगे???"
तीनों के चेहरे लटक गये.. कोई भी चेहरा उन्हें पहचाना हुआ नहीं लग रहा.
"यही तो मुश्किल है साहब, आज कोई भी पहचान में नहीं आ रहा."
"पता नहीं क्या माजरा है!!!!"
तीनों पशोपेश में एक दूसरे को देख रहे हैं, उनकी हैरानी अब डर में बदलती जा रही है.

क्रमशः ........

इसके बाद यहाँ पढ़ें -


10 comments:

  1. ये तो कोऊ लम्बी साजिश में अटक गये लगता है...आशा है कथा अभी जारी है..कृपया क्रमशः लिख दिया करें.

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  2. बहुत ही भावपूर्ण निशब्द कर देने वाली रचना . गहरे भाव.

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  3. keep it up .

    baaki discussions hm log to kar hi lenge

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  4. जी, समीर जी, आपके सुझाव का ध्यान रखूंगी. धन्यवाद.

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  5. अचानक मोड़ खाए हुए कहानी ..
    कई बातें उभर कर आ रही हैं...


    क्या ये सब सिर्फ इसी धंधे के लिए है....?

    इतना सब नाटक करने के बजाय रोविन...कुछ ले दे कर भी तो बच सकता था.....


    क्या वाकई पुलिस को नहीं पता के....

    :)
    :)

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  6. मामला संगीन होता जा रहा है...

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  7. परछाईयों का शहर accha laga..

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  8. bahut hi acha likhti hai aap.....sargarbhit

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