शुक्रवार, 11 मई 2018

देश निर्माण और हमारी जिम्मेदारी

लगभग चार साल पहले की बात है। मेड्रिड म्युनिसिपेलिटी की तरफ से मेरे बच्चों के स्कूल में एक पर्यावरण समिति बनाई गई थी।  उसमें  स्कूल के डायरेक्टर, हेड ऑफ़ स्टडी, दो- तीन टीचर्स , दो कक्षा प्रतिनिधि बच्चे, सफाई कर्मचारी और दो ऑफिस कर्मचारी के अलावा दो अभिभावकों को भी लिया गया। मुझे अभिभावकों के प्रतिनिधि के रूप में भाग लेने का मौका मिला। 

साल में तीन बार मीटिंग होती। तब वहाँ एक निर्णय यह लिया गया कि स्कूल में बच्चों को कचरा अलग अलग छंटनी करके फेंके जाने की शिक्षा दी जानी चाहिए। जैसे कि प्लास्टिक वैस्ट अलग डब्बे में, कागज़ और गत्ता अलग डब्बे में और आर्गेनिक वैस्ट अलग डब्बे में। इस से उन्हें हर तरह के वैस्ट  को ''रीसायकल करना'' समझाना आसान हो जायेगा। 

अब इस कार्य को मजेदार ऐसा बनाया जाए कि बच्चों को सहज ही समझ भी आ जाए और वे इस नियम का पालन न सिर्फ अपने स्कूल में करें बल्कि घर में भी सभी को यह नियम सिखाएं। इसके लिए सफ़ेद रंग के कचरे के नये डब्बे मंगवाये गए और उनके  ढक्कन के ऊपर रंग बिरंगे स्टिकर लगाए गए जो यह बताते थे कि किस डब्बे में कौनसा कचरा जायेगा। डब्बे इतने आकर्षक थे कि बच्चों को सहज ही अपनी और खींच लेते थे। ढक्कन भी इतने आसान कि किसी को इन ढक्कन को हाथ लगाने की आवश्यकता ही न हो। यानि आप धकेलते हुए कचरा फेंकेंगे तो ढक्कन अपने आप खुलेगा और फिर बंद हो जायेगा। पूरे स्कूल में दो दो डब्बों का सेट जगह जगह रखवाया गया ताकि बच्चों को अपने नजदीक ही डब्बा दिख जाए और वे चित्र देख कर सही डब्बे में सही कचरा फेंकने की आदत डालते जाएँ।  इसके अलावा एक एक डब्बा नीले रंग का हर एक कक्षा में पहले ही रखा गया था जिसमे सिर्फ कागज़ और गत्ता  ही फेंका जाता था। 

यही नहीं, बाद में हर एक कक्षा से दो दो  प्रतिनिधि और चुने गए जो यह सुनिश्चित करते थे कि बाक़ी सभी बच्चों को कचरा छंटनी करने की बात समझ में आ गई है। मज़ा तब आता था जब बच्चे खुद अपने माता-पिता का हाथ पकड़ कर इन सुन्दर से कचरे के डब्बों के समीप ले जाते और उन्हें कचरा छंटनी करने का नियम बताते। 
 मैंने तीन साल तक इस प्रोजेक्ट में भाग लिया।स्कूल की तरफ से हर साल नए बच्चों को इस प्रोजेक्ट में इन्वॉल्व किया जाता और इसके सुखद परिणाम देखते हुए स्कूल को दूसरे सालअवार्ड भी मिला। 

 जिस तरह से एक मुहिम सी चला कर स्कूल के सभी छोटे बड़े लोगों को इस प्रोजेक्ट में सम्मिलित किया गया वह काबिले तारीफ है।  इन छोटे बच्चों के जेहन में आज जो साफ़ सफाई और रीसायकल का कांसेप्ट बिठाया जायेगा, वह कांसेप्ट निश्चित ही उन्हें बड़े होने पर अपने आसपास के परिवेश में सफाई की आदत का संचार तो करेगा ही उन्हें देश का अच्छा नागरिक बनने को भी प्रेरित करेगा। बड़े होने पर यही शिक्षा वे अपने बच्चों को भी देंगे। 

यह शिक्षा एक तरह से स्कूल को और समृद्ध करने का तरीका साबित हुई जबकि स्कूल में पहले से ही हर साल ''बेस्ट आउट ऑफ़ वैस्ट'' प्रतियोगिता का आयोजन होता आया है। 

किसी भी देश का निर्माण इसी तरह होना चाहिए कि धीरे धीरे अच्छी आदतें अपनी जड़ें जमाती जाएँ और देश निर्माण में हर व्यक्ति की विशिष्ट भागीदारी भी निश्चित हो जाए। आख़िर एक देश उसके निवासियों से ही निर्मित होता है, इसलिए यह समझना आवश्यक है कि देश के प्रति जिम्मेदारी भी सभी की होती है चाहे वे बच्चे हों या बड़े। महत्वपूर्ण यह है कि छोटे से छोटे काम के प्रति भी सम्पूर्ण समर्पण रहे और कभी भी निष्ठा में कमी न आये। 
-पूजा अनिल 

5 टिप्‍पणियां:

  1. बचपन से संस्कार के रूप मेंं यह पाठ सिखायें जायें तो आदत में शामिल हो जाते हैं. हमारे देश में गुरुकुल व्यवस्था में बच्चे यह सब सीखते थे मगर जाने कब यह सीखें लापता हो गईं....जरुरी है कि हम इसके बारे में बात करते रहें, बतातें रहें.
    प्रेरक पोस्ट!

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    1. वही तो। बचपन से ही नींव मजबूत होगी तो वयस्क होने पर संस्कार भी वैसे ही बन जायेंगे।
      शुक्रिया वाणी दी।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (12-05-2017) को "देश निर्माण और हमारी जिम्मेदारी" (चर्चा अंक-2968) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. बहुत शुक्रिया शास्त्री जी।

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  3. शुरुआत बचपन से ही होना चाहिए सार्थक पहल

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