Wednesday, March 26, 2014

रुकने का श्रम


रुकना और ठहरना वहाँ 
जहां से लौटने का रास्ता ना सूझे 
तो प्रगति की ओर बढ़ाना कदम

पार कर चुके तुम पड़ाव उत्कृष्टता का 
सुख भटकाव का अब रहे भोग 
मंज़िल छूना  ही नियति तुम्हारी 
फिर रुकने का श्रम व्यर्थ की लकीर है  

दो बातों में एक कहानी  गढ़ी 
एक, पलक में छुपी 
वो सारी  फड़कन जो 
घर से निकने से पहले चेता गई तुम्हे 

दूसरे, जीभ पर निवास करती 
वो सारी  हिचकियाँ जो 
पुकार पुकार यहाँ प्रियतम लाई  तुम्हे 

तन पर ओढ़ लेना सदैव वस्त्र नहीं
धरती वसंत की  श्रृंगारित दुल्हन  
आदिकाल से मोहती   
धरा स्वरूपा अश्रृंगारित स्त्री

इसी स्त्री  पर ठहरे और रुके अनंत समय से तुम 
यही आनंद की माहवार 
यही तुम्हारी सजग तन्मयता 
स्पर्श का अर्थ ऊँगली छूकर लौट जाना नहीं 
मेरी उँगलियों से मिली अनंत राहें तुम्हे
रुकना और ठहरना वहाँ 
मंज़िल के  चिन्ह तुम्हारी कथा कहें जहां 

4 comments:

  1. लगभग ढाई साल बाद ब्लॉग पर कुछ पोस्ट करना पुनः खोये हुए प्रेम से मिल जाने सा आनंद दे रहा। आशा है आप सभी का साथ उत्साह वर्धन करेगा। धन्यवाद!

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  2. बहुत सुंदर रचना

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