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सोमवार, 2 मई 2022

मैं खत रूहानी लिखती हूँ

 


मेरे ब्लॉग की यह सौवीं पोस्ट समर्पित है मेरे देश के नाम तथा मेरे सभी परिवारजन, दोस्तों के नाम। मैं कृतज्ञ हूँ उन सभी मित्रों और चाहने वालों के प्रति, जिन्होनें ब्लॉग्गिंग के दौर में मेरे लेखन के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की एवं  मेरे अच्छे या बुरे, हर तरह के लेखन में मेरे साथ बने रहे, मित्रता निभाई और आगे बढ़ने को प्रेरित किया। आप सभी को पूर्ण हृदय से  प्रेम भरा धन्यवाद भेजती हूँ। 

साढ़े सात हज़ार किलोमीटर की दूरी से जब मैं अपना शहर, उदयपुर, देखती हूँ तो वो बस एक छोटा सा शहर नहीं रह जाता, बल्कि वो सम्पूर्ण देश में तब्दील हो जाता है।  धरती का विस्तार मेरी दृष्टि में प्रतिबिम्बित हो कर अधिक विस्तृत हो जाता है। कदाचित मेरे शहर की बात कहते हुए मैं अपने पूरे देश की धड़कन को महसूस कर रही होती हूँ। 


मैं इस दिल की सच्ची ज़ुबानी लिखती हूँ,
मेरे देश को मैं खत रूहानी लिखती हूँ,
कोने कोने पहुंचे सन्देश इन नम आँखों का, 
मासूम बचपने सी कोरी मनमानी लिखती हूँ। 
1 
मैं माटी की गंध यहाँ संग लाई  हूँ,
इतिहास अपने वीरों का सुना सुना इतराई हूँ, 
कभी अपने देश की निशानी बन कर लहराई हूँ, 
मैं उसी तलवार की तेज़ रवानी लिखती हूँ,
मेरे देश को खत रूहानी लिखती हूँ। 
2 
दैवीय उपहार हमारी भारत भूमि है, 
देश विदेश में सम्मानीय यह भूमि है,
बागों में, इसके खेतों में, खिलती जो तरुणाई है, 
मैं उसे तमाम ऋतुओं की रानी लिखती हूँ, 
मेरे देश को मैं खत रूहानी लिखती हूँ। 
3 
न चोर न डकैत, न हो देश में भ्रष्ट कोई, 
नारी का सम्मान न करे कभी नष्ट कोई, 
देश को विश्व में न करे बदनाम कोई, 
प्रार्थना यह अपनी, भावभीनी लिखती हूँ, 
मेरे देश को मैं खत रूहानी लिखती हूँ। 
4 
चाहे मैं लाख समुन्दर पार जा बसा,
मगर देश हिन्द सदैव हृदय का ताज बना, 
है यही देश जो नसों में आनंद बन कर बहा, 
मैं अपने उसी प्रिय देश की कहानी लिखती हूँ, 
मेरे देश को मैं खत रूहानी लिखती हूँ। 
- पूजानिल 

गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

जीवन, बेअंत जीवन

 

जीवन है एक बड़ी नाव , 

सांस छोटी सी नैया। 

जीवन  तैरता रहता है पानी पर, 
स्थिर कभी, गतिमान कभी। 
दूर तक साये सा दिखता रहता है। 
फिर एक दिन धम् से ग़ायब! 
जैसे कोई चमत्कार। 


साँस आती है, जाती है, 
ओझल हो जाती है, 
पलक झपकने तक कि फुरसत नहीं देती 
कि उसे ठीक से अनुभव कर पायें।
 
जिस क्षण पकड़ में आती है, 
छटपटाहट दमदार देती है, 
मानो अगले ही पल प्राण निकल जायें। 


और वहीं ततक्षण आज़ाद हो 

विलीन हो जाती है अपने राम में! 



उसकी लीला का कोई अंत ही नहीं, 
जीवन भी बेअंत नहीं! 
- पूजानिल 

शुक्रवार, 29 मई 2020

अनुभूतियाँ 

साथ चलना आसान न था

हम एक दूसरे को अनुभव करते हुए 

कुछ दूर तक साथ चले 

आखिरी बार उस शांत झील किनारे 

हमने अपने आंसुओं से सुख लिखा 

और 

बिछड़ कर एक दूसरे की याद में रहने लगे 

धूप और छाँव की तरह 

अपनी अनुभूतियों का आना जाना 

तरंग दर तरंग देखा हमने 

और 

देखा यह कि हमारा साथ कितना सुखद था! 

जीवन में पीछे छूटा हुआ सुख 

आगे आने का वादा कहाँ करता है! 

जीवन लेकिन अपनी ही गति से चलता है।  

तुम थे तो तुम्हारे नाद से मेरी सुबहें जागीं 

तुम नहीं हो तो तुम्हारे ही मौन से 

मेरी सांझ को रंग मिलता है। 
 
मन के कितने मौसम बदल गए 

लहरों की तरह हम बन बन कर मिट गए।  

विदाई वाला अँधेरा जाता नहीं मन से, 

सुनो, अब यादों से भी विदा कर दो न!  

-पूजानिल 

मंगलवार, 26 मई 2020

वापसी

चेहरे की झुर्रियाँ बता रहीं थीं 
कि आत्मा पर 
अनावश्यक अनिचछाओं का बोझ है । 
अपने सुंदर सलोने रूप के 
तुलनात्मक अनुपात में सोचूँ 
तो आत्मा अनन्त गुना सुंदर होनी चाहिये । 
मैं समझती हूँ कि 
अनिचछाओं ने किया त्वचा को  झुररीदार 
और ह्रदय को अपवित्र। 
मुझे माफ़ करना ईश्वर! 
मैं उतनी पवित्र और स्वच्छ-सुंदर आत्मा 
तुम्हें नहीं लौटा पाऊँगी 
जैसी तुमने उस अबोध कन्या को 
धरती पर भेजते हुए भेंट की थी। 
-पूजानिल 

शनिवार, 16 मई 2020

चिरंजीवी भव 


1.
रेत के कणों सी
बेबस उड़ रही है। 
ज़िन्दगी है कि वाष्प है?
महसूस कर भी लो तो 
हाथ आती नहीं है! 
मन जल रहा है, 
उन सब के दुःख से, 
जो चले गए यहाँ से दूर 
किन्तु   
वे इस धरती के मेहमान थे।  
देखो न, 
धरती ने अपना वादा निभाया है,  
उनको दी है 
जगह 
अपने विस्तृत सीने पर।  
जहाँ सर रख कर सोना 
सबसे आरामदेह लगता है 
अनुभूति में वो माँ का साया लगता है।

2.
सुनिश्चित है जीवन अवधि,
बीत जाने की कला सीख लेनी चाहिये। 
लेकिन, मन कैसे माने?
यह क्या जन्मों से ही नादान है? 
बीत जाने का अर्थ न कभी समझ पाया है न समझेगा। 
और समझे भी तो क्यों समझे? 
इसकी मंशा तो सदैव यही रहेगी न, 
रेत का कण उड़ जाए लेकिन बीतने  न पाए, 
दीवार में चुन जाए लेकिन बीतने न पाए,
किसी रेत के टीले पर से उड़कर 
अन्य किसी टीले पर पहुँच जाए, 
लेकिन 
बीतने न पाए! 
कितना खारापन घुल गया है हवा में, 
ज़िन्दगी है कि बादल है, बरसती ही जा रही है! 
-पूजानिल 

मंगलवार, 5 मई 2020

एक वाइरस ने  बदला धरा को विशाल कब्रिस्तान में

कितना लाचार महसूसती होगी
न यह पृथ्वी!
कैसे हर सांस निशब्द रोती होगी!
बीज की जगह 
बेजान देहों से 
भरी जा रही है इसकी मिट्टी, 
मासूम किलकारियों की जगह 
करुण क्रंदन से 
गूँज रही है हर एक वादी।
मन करता है कि मैं 
बन जाऊँ आकाश, 
अपने बड़े से आलिंगन में 
समेट लूँ सम्पूर्ण पृथ्वी का दुख, 
धरती के मौन से पहचान लूँ 
आंसुओं का गीलापन।
मैं जानती हूँ 
धरती का रुदन सुनने के लिए 
ओस बनना होगा! 
-पूजानिल

मंगलवार, 14 जनवरी 2020

बदलाव 

साल बीतने से पहले 
रूठा हुआ समय बीत रहा था..
मन का अधखिला मौसम बीत रहा था 
उदास शामों का नील-पनील स्कार्फ़ 
और चाय का अदरकी सिप बीत रहा था 
कुछ उड़ती ज़ुल्फ़ों के नक़ाब संग 
आसमान का मिज़ाज बीत रहा था 
“मैं” ही कहाँ ठहर पाया..
जाती हुई जगमग रात के साथ ही 
मेरा उद्दंड “मैं” बीत रहा था।
-पूजानिल 

बुधवार, 11 सितंबर 2019

अनुचित कलंक


प्रत्येक दिन, उन दोषों के साथ,
मैं थोड़ा थोड़ा खुद को निगल जाती हूँ
बिना किसी कारण
तुम जो अनुचित कलंक मुझ पर लगाते हो।
प्रत्येक दिन मैं थोड़ा थोड़ा
काले बुरादे में बदलती जाती हूँ,
जिसमें स्वयं मेरा ही,
सांस लेना कष्टमय हुआ जाता है।
मैं कोशिश करती हूँ
किसी प्रभावी मुखावरण से
मुंह और नाक ढकने की,
जो रिसाव से अभेद्य हो।
किन्तु बुरादा नहीं रुकता,
हमेशा कोई न कोई राह खोज ही लेता है,
खुली हवा तक पहुँचने की।
एक रोज़ तुम्हारे शहर का आकाश,
आच्छादित होगा
एक काले बुरादे से निर्मित बादल से।
लोग सूर्य रश्मियां नहीं देख पाएंगे,
मौसम विज्ञानी चकित हो कहेंगे कि
कदाचित यह किसी बुझी हुई आकाशगंगा का चूर्ण है।
जो लाखों वर्ष पूर्व विद्यमान थी।
कोई उनसे सवाल नहीं करेगा कि
कैसे वह सारा चूर्ण हमारे युग में आ पहुंचा?
लेकिन सिर्फ तुम जानते होंगे कि
यह बादल उन अनुचित कलंकों से बना हुआ है
जो अब हर तरह के दासत्व से मुक्त हो चुके हैं।
-Poojanil
(यह कविता मूलतः स्पेनिश में लिखी थी और मैंने स्वयं इसका अनुवाद किया है।)

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

इच्छाधारी

इच्छाधारी 
कितने तो करुण स्वर में वे, पूछते हैं
हाल मन का 
अथाह प्रेम भरे वे, करते हैं दावा 
सच्ची दोस्ती का 
छोटी से छोटी बात आप की,  
रखते हैं वे याद 
किसी तरह अंतस की गन्दगी, 
छुपा लेते हैं शब्दों से, 
बस भूल जाते हैं, 
कि 
सत्य के पास, 
छिपने के ठिकाने कम होते हैं।  


शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

कैफियत

दिन गुदगुदाने के होते तो
मैं सुनहरी धूप सी दिखती,
संवरने सजने के जो होते दिन तो 
मुझमे सभी नदियों की छाया उमड़ आतीं, 
उदासी के दिनों में हर मौसम बर्खास्त होकर 
मैं सिर्फ और सिर्फ रिम झिम बूंदों सी रोती, 
जब सर्दी से अकड़ते हों तन, डूबते हों मन 
तो मैं गर्मास भरा कहवा का प्याला  होती, 
मगर 
हर मौसम के मध्य तेज आंधी तूफ़ान होकर 
दिलों पर दस्तक देना मेरी मीठी शरारत होती 
-पूजानिल 

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

स्कूल के मध्यावकाश

स्कूल के मध्यावकाश  

मेरे पास एक दोस्त थी।
उसका होना 
मेरे लिए 
अदृश्य अकथ्य सहारा था।
बहुत सारी लड़कियों की तरह 
वो भी वहीँ थी,
जहाँ मैं भी थी स्कूल के मध्यावकाश में,
जिस तरह अन्य लड़कियों को 
मज़ा आता था 
सतौलिया, पकड़म पकड़ाई 
और कंचे खेलने में 
उसे भी पसंद था ठीक यही,
लेकिन मेरी पसंद अलग थी, मेरे खेल भी अलग थे,
मुझे देखना होता था 
गिलहरियों को पूँछ मटकाते भागते हुए, 
तितलियों को एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक मंडराते हुए 
और 
छोटे छोटे कंकड़ पत्थरों को उड़ते हुये,
और बस इसीलिए मैं उन सारी लड़कियों से दूर जा,
ग्राउंड के दूसरे छोर पर दौड़ती, 
देखती गिलहरियों को, तितलियों को 
और अंत में  
चुनती कुछ कंकड़, 
हथेली में रख कर उँगलियों से कुछ इस तरह उड़ाती उन्हें कि वे दूर तक उड़ते हुए जाएँ लेकिन लौट न पायें,
मैं इस बात का रखती ख्याल कि इन कंकड़ पत्थरों से किसी को चोट न पहुंचे,
इस लिहाज से मैं कुछ अधिक ही दूर हो जाती बाकी लड़कियों के झुण्ड से,
खेलती, चुपचाप, किसी से कुछ कहे बगैर, 
वो, सतौलिया खेलते- खेलते अचानक रुक जाती, 
उसकी दृष्टि, कुछ खोजते हुए मुझ तक आकर रूकती, 
वो, अपना खेल छोड़ कर पूरा स्कूल ग्राउंड दौड़ कर पार करते हुए मुझ तक चली आती,
मुझे देख मुस्कुराती किसी गाँव की बाला सी निश्छल 
कुछ शरारत और कुछ आग्रह से कहती, '' आओ, देखें, आज किसका कंकड़ दूर तक उछलता है?'' 
मैं मुस्कुराती और चुने हुए कंकड़ दोनों के बीच बाँट लेती। 
वो जीत रही होती थी  
फिर हारने लगती थी,
उसे उस हार में मज़ा आता,
उसे मेरे चेहरे पर जीत का निशान देखने में मज़ा आता,
वो तब तक हारती जब तक सभी चुने हुए कंकड़ समाप्त न हो जाएँ,
फिर मेरा हाथ पकड़ जल्दी से मुझे उड़ा ले जाती, कहती, ''चलो, अब मेरे साथ सतौलिया खेलो!''
अब मेरी बारी आती,
मैं हारती, मुझे मज़ा आता,
वो जीतती, मुझे ख़ुशी होती, 
इस तरह हमारे स्कूल के मध्यावकाश खुशियों की सौगात बन जाते। 
स्कूल से कॉलेज के सफर में हम बिछड़ गए। 
फिर मुलाक़ात होने में बीत गए कई वर्ष। 
एक दिन मुझे बड़ी तेज स्मरण हुआ उसका और 
किसी मित्र से पता पूछ उसका, पहुंची उसके घर। 
लेकिन मैं नहीं जानती थी कि उसका पता अपनी पुस्तिका में मृत्यु देव ने भी  कर लिया था दर्ज! 
भीषण गठिया रोग से वो वो चुकी थी बेजार, 
किसी के सहारे के बिना हिल सकने में भी थी वो तो लाचार,
मेरा दिल वहीँ एक पल में मर गया कई कई बार 
मेरी आँखों में आँसूं भर भर कर बह जाने को थे बेकरार, 
लेकिन मैंने उसे संभाला और उसने मुझे,
कुछ देर के लिए मैं गई थी किन्तु घण्टों बैठी रही उसका हाथ पकड़,
उसने कहा था, ''शायद आज के बाद मैं तुमसे कभी मिल ना पाऊं!'' 
अब हम दोनों के आँसूं बाँध तोड़ बह निकले,
वहीँ एक दूसरे को थामे हुए  
हम दोनों तितलियों की भांति फूल फूल मंडरा आईं,
हम दोनों ही गिलहरी की तरह दौड़ रही थीं,
हम दोनों के पत्थर कंकड़ वहां तक उछल रहे थे जहाँ से कोई लौट कर नहीं आता, 
हम दोनों सतौलिया में जीत गईं  
किन्तु मृत्यु देव के आगे हार गईं। 
हाँ, मैं गर्व से कह सकती  हूँ, मेरे पास भी एक दोस्त थी,
जिसका होना मेरे लिए अदृश्य अकथ्य सहारा था।
-पूजा अनिल 




 




बुधवार, 29 मई 2019

बड़ी बिंदी वाली सखियाँ

कैसी इतरा रही हैं मेरी सखियाँ,
बड़ी सी बिंदी माथे सजाए,
ज़रा देखो तो... 
कैसे कैसे सपने संजोए 
रंग बिरंगी बिंदी के सहारे,
कैसी कैसी विपत्ति को कर आई हैं पार,
पहुंची किस तरह किनारे,
कह रही हैं अपनी जुबानी,
बिंदी वाली कहानियां सुहानी, 
मेरी सखियाँ, 
ज़रा देखो तो... 
कितनी तो कठिनाइयाँ आईं,
कितनी तो राहें इन्होने बनाईं, 
खोज ही लेती हैं हर मुश्किल का हल,
रुक जाने का इनको नहीं कोई विकल्प, 
कितनों के लिए बनीं प्रेरणा,
कितनों का हुईं आसरा,
कितने ही ससुराल सँवारें 
कितने ही मायके तारें,
मेरी सखियाँ, 
ज़रा देखो तो... 
कौन होगा जो इनके 
साहस पर न होगा प्रसन्न!
कौन होगा जो इनके लिए 
न कहेगा आशीर्वचन!
कौन होगा जो इनकी 
चंचल धार में न बह चलेगा! 
कौन होगा जो इनकी 
मधुर लोरी में न विश्राम लेगा! 
हर फ़न माहिर हैं 
मेरी सखियाँ, 
ज़रा देखो तो... 
हर कदम देख भाल 
कर हैं चलतीं,
आसमान छूने का 
संकल्प हैं करतीं,
मन में भरे हैं 
लगन और समर्पण,
आत्मा परमात्मा की  
विवेचना हैं करतीं,
मस्तक पर धारे हुए 
विशाल बिंदी,
हर रोज़ मुझे 
और अधिक अपनी हैं लगतीं 
मेरी सखियाँ, 
ज़रा देखो तो... 
-पूजा अनिल 

शनिवार, 9 फ़रवरी 2019

इरादों का सफर


मैं उस जीवन को चलते हुए 
देख रही थी,
जो तत्पर था मुक्त होने को 
मैं रोक लेना चाहती थी 
मुक्ति पथ! 
पर तभी मैंने पाया कि मैं 
इस लायक भी नहीं कि 
सांस ले पाऊँ स्वेच्छा से!
बस, तभी से त्याग दिया 
इरादों का सफर 
और चल पड़ी उधर 
 मिला जब जब जो जो पथ!
-पूजा अनिल 

बुधवार, 14 नवंबर 2018

साथी कौन?



अकेले में रो लेना, 
अकेले ही दु:खी होना,
अकेले में प्रेम करना, 
अकेले ही प्रेम को नकारना,
अकेले में गीत गाना 
अकेले ही मुस्कुराना, 
तमाम लोग हों आसपास 
तो भी अकेले थिरकना, 
क्या पता कौन  
किसी कोमल पल में 
साथ होने का एहसान जता दे! 
क्या पता किसी को 
अचानक अपने 
अहम का नशा हो जाये!
क़दम दर क़दम 
अकेले ही तुम चलना 
इस क़दर ख़ामोश कि 
तुम्हारा चलना,
मीलों मील 
कोई जान ही न पाये।
अकेले ही जीवन पथ पर
कुसुम की तरह बिखरना,
विनम्र श्रद्धांजली की तरह
अकेले ही तुम मुरझाना। 
-Poojanil

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

मरीचिका

हम धीरे धीरे ख़त्म हो रहे थे 
जैसे एक बादल बूँद बूँद बरस रहा हो 
देर तक हवा में झूलने की इच्छा लिये हुए। 
हम कम कम ख़्वाब देख रहे थे 
मानो सारा ख़्वाब अाज ही देख लिया 
तो सारी सांसें भी आज ही ख़त्म हो जायेंगी। 
हम और जीना चाहते थे, 
लेकिन धरती भारी हुई जा रही थी 
और हमारा मरना निश्चित ही तय था। 
हमारे पास नीले गुलाब थे 
किन्तु अनदेखे लाल गुलाब की अबूझ आस ने 
साँस को जन्मों तक अटकाए रखा। 
हमारी हड्डियाँ हर रोज़ चूरा हुए जा रहीं थीं 
और हम दिन रात नाहक ही प्रेम प्रेम रट रहे थे। 
कोई तमाशा चल रहा था आँखों के आगे, 
टाँगे मरगिल सी थीं, 
किन्तु मन ठुमकता रहा प्राण चलने तक। 
-पूजा अनिल

सोमवार, 25 जून 2018

सबकी गरदन झुकी है

मेरे देश में राजनीतिक उठापटक का दौर जारी है 
आरोप प्रति आरोप का दौर भी तारी है 
उधर सीमा पर गतिविधि भारी है 
इधर किसानों की अपनी परेशानी है 
बच्चों के भविष्य के पीछे को कोई हाथ धोकर पड़ा है 
किसी ने एक दम हाथ हैं छुड़ा लिए  
अमीरों को फ़ुरसत नहीं दिखावे से 
गरीबों को रोज़ की रोटी जुटाने से 
मध्यम वर्ग सोशल नेटवर्क की गिरफ्त में उलझा है 
मोबाइल के फॉरवर्ड गेम में किसी का मन रमता है 
इतनी आपाधापी में कौन किसकी सुने 
हर किसी ने बेतरह कान हैं ढक लिए  
बहरहाल, किसको कहूँ यह सब, सबकी ही गर्दन झुकी है 
मैं कहती हूँ सब अनदेखा कर पूजा, तेरी ही दृष्टि बुरी है ।
-पूजा अनिल 

शुक्रवार, 4 मई 2018

जाने ज़िन्दगी


कोई तोड़ मरोड़ कर पढ़ाया गया इतिहास नहीं 
बेहद सुनियोजित पावन मंत्रोच्चार है ज़िन्दगी। 

दो पटरियों पर रेंगती भाप वाली रेल नहीं 
खुली हवाओं का बहान तेज़ रफ़्तार है ज़िन्दगी। 

परदे में छुपकर वार करने की राजनीति नहीं 
सुबह की मुलायम धूप  का विस्तार है ज़िन्दगी। 

दोस्ती के संदेश में रचा दुश्मनी का मायाजाल नहीं 
शिशुवत मुस्कान का पवित्र त्यौहार है ज़िन्दगी। 




रविवार, 18 मार्च 2018

गाली देने वाली लड़कियाँ

कभी उनसे बात करना तो 
साथ रखना तहज़ीब और तमीज़ 
वर्ना गालियों की बौछार 
मिल सकती है उपहार।  
पीड़ा की 
असहनीय आग से 
गुज़र चुकी होती हैं  
जन्मों जन्मों से 
ज़ख्मों की 
टीस में पली होती हैं   
गाली देने वाली लड़कियाँ। 


उन्हें लगता है उनके सर पर 
मोर पंखों का ताज रखा है 
जिसकी ऊँची उड़ान से वे 
सैर कर आएँगी 
दुनिया भर के अजूबों की  
लेकिन वे कभी भूलती नहीं कि 
कांटें बिछे रहते हैं 
उनके क़दमों तले , 
इसीलिए 
अक्सर दोगली होती हैं 
गाली देने वाली लड़कियाँ। 
घिन्न आने लगती है 
करके उनसे वार्तालाप 
जैसे अचानक घेर लेता है 
कोई अबूझा संताप 
पीछा छुड़ा दूर जाने 
की  उठती है तमन्ना 
बगल में मचलती है खुजली 
चेहरे पर दमकता है पसीना 
तभी तो, 
लगती हैं बदबूदार और कुरूप  
गाली देने वाली लड़कियाँ। 

नहीं करतीं वे बे-बात कोई विवाद 
अक्सर हॅंस हॅंस करती हैं परिहास  
पुराने प्रेमी के वे बताती नहीं किस्से 
छुपा भी नहीं पातीं टूटे दिल के हिस्से 
जिससे चाहा था कहना 
मन की प्यारी बात 
वही निकला कायर 
छोड़ा बीच राह साथ 
कहा तो था..  
बड़े घाव दिल में रखती हैं समेटे
गाली देने वाली लड़कियाँ। 
-Poojanil

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

एक पाती

एक पाती आती है,
मैं आकाश चूमना चाहता हूँ,
आभासी है आकाश, महसूस होने से परे
मैं धरती चूम लेता हूँ.
एक पाती आती है,
मैं नदी को गले लगाना चाहता हूँ,
चुलबुली है नदी, रूकती नहीं कहीं,
मैं पत्नी से लिपट जाता हूँ.
एक पाती आती है,
मैं घने वृक्ष सा झूमना चाहता हूँ,
झड चुके हैं पत्ते,
मैं बच्चों को निकटतम खींच लेता हूँ,
फिर करता हूँ प्रतीक्षा,
और एक पाती आये...!


कविता हूँ मैं

तुम्हारी किताब में  लिखी हुई, 
बेअंत नज़्म हूँ मैं,
तुम्हारे शब्दों में कही गई, 
आँखों में ठहरी हूँ मैं ,
तुम्हारे ख्वाब में पली हुई ,
हज़ार रंगों की कविता हूँ मैं .
यूँ पढ़ना मुझे तुम, कि मेरे 
सारे रंग तुम में समा जायें।