सोमवार, 2 मई 2022

मैं खत रूहानी लिखती हूँ

 


मेरे ब्लॉग की यह सौवीं पोस्ट समर्पित है मेरे देश के नाम तथा मेरे सभी परिवारजन, दोस्तों के नाम। मैं कृतज्ञ हूँ उन सभी मित्रों और चाहने वालों के प्रति, जिन्होनें ब्लॉग्गिंग के दौर में मेरे लेखन के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त की एवं  मेरे अच्छे या बुरे, हर तरह के लेखन में मेरे साथ बने रहे, मित्रता निभाई और आगे बढ़ने को प्रेरित किया। आप सभी को पूर्ण हृदय से  प्रेम भरा धन्यवाद भेजती हूँ। 

साढ़े सात हज़ार किलोमीटर की दूरी से जब मैं अपना शहर, उदयपुर, देखती हूँ तो वो बस एक छोटा सा शहर नहीं रह जाता, बल्कि वो सम्पूर्ण देश में तब्दील हो जाता है।  धरती का विस्तार मेरी दृष्टि में प्रतिबिम्बित हो कर अधिक विस्तृत हो जाता है। कदाचित मेरे शहर की बात कहते हुए मैं अपने पूरे देश की धड़कन को महसूस कर रही होती हूँ। 


मैं इस दिल की सच्ची ज़ुबानी लिखती हूँ,
मेरे देश को मैं खत रूहानी लिखती हूँ,
कोने कोने पहुंचे सन्देश इन नम आँखों का, 
मासूम बचपने सी कोरी मनमानी लिखती हूँ। 
मैं माटी की गंध यहाँ संग लाई  हूँ,
इतिहास अपने वीरों का सुना सुना इतराई हूँ, 
कभी अपने देश की निशानी बन कर लहराई हूँ, 
मैं उसी तलवार की तेज़ रवानी लिखती हूँ,
मेरे देश को खत रूहानी लिखती हूँ। 
दैवीय उपहार हमारी भारत भूमि है, 
देश विदेश में सम्मानीय यह भूमि है,
बागों में, इसके खेतों में, खिलती जो तरुणाई है, 
मैं उसे तमाम ऋतुओं की रानी लिखती हूँ, 
मेरे देश को मैं खत रूहानी लिखती हूँ। 
न चोर न डकैत, न हो देश में भ्रष्ट कोई, 
नारी का सम्मान न करे कभी नष्ट कोई, 
देश को विश्व में न करे बदनाम कोई, 
प्रार्थना यह अपनी, भावभीनी लिखती हूँ, 
मेरे देश को मैं खत रूहानी लिखती हूँ। 
चाहे मैं लाख समुन्दर पार जा बसा,
मगर देश हिन्द सदैव हृदय का ताज बना, 
है यही देश जो नसों में आनंद बन कर बहा, 
मैं अपने उसी प्रिय देश की कहानी लिखती हूँ, 
मेरे देश को मैं खत रूहानी लिखती हूँ। 
- पूजानिल 

रविवार, 1 मई 2022

माँ के लिए पत्र

 



मेरी मम्मा को समर्पित 

माँ से सीखने का क्रम तो ताउम्र चलता रहता है।  कभी रसोई में खाना बनाने का तरीका तो कभी घर में साज सज्जा का सलीका, कभी रिश्तेदारी निभाने का शिष्टाचार तो कभी सामाजिक कर्त्तव्य पूर्ण करने का परिष्कार।  

अक्सर ऐसा होता है कि मैं माँ के साथ फ़ोन पर बातें करते समय अपने परिवार, परिवेश और नैतिक शिक्षा पर बात करती रहती हूँ। वैसे तो होना यूँ चाहिए कि माँ मुझे इन सब बातों पर भाषण दे लेकिंन होता इसका ठीक विपरीत है।  मैं माँ के सामने बड़ी बड़ी ज्ञान ध्यान की बातें करती रहती हूँ और मेरी माँ बड़े मन और जतन से उन बातों को इस तरह ध्यानपूर्वक सुनती हैं  जैसे उन्हें इन सभी बातों का कोई ज्ञान ही ना हो! मैं उन से जो कुछ भी कहूं, वे कभी उसका प्रतिरोध नहीं करतीं।  और सच कहूं तो उनकी असाधारण रूप से स्नेह और सम्मान देने को एकमेक कर देने वाली यह सहज बात मुझे उनके प्रति अगाध श्रद्धा से भर देती है। 
             
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स्पेन में मई के प्रथम रविवार को मातृ दिवस मनाया जाता है, जैसे कि आज एक मई को मनाया जा रहा है। माँ को मातृ दिवस पर अनंत प्रेम के साथ बधाई भेज रही हूँ। मेरे पास माँ के लिए लिखा गया एक पुराना पत्र है, अब माँ तो नहीं रहीं, लेकिन उनकी याद प्रति पल जीवित रहती है, आज उन्हें लिखा मेरा यह पत्र अपने ब्लॉग पर साझा कर रही हूँ जो उनके जीते जी उन तक भेजने की कभी हिम्मत  नहीं जुटा पाई। ​

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15/09/2019 
मद्रिद 

मेरी प्यारी ममा!

कैसी हो आप?
इस समय यानि इन दिनों, मैं जब भी आप से पूछती हूँ कि ''आप कैसी हो?'', लगता है जैसे मैं कोई अपराध कर रही हूँ। 

मन से और बुद्धि से भी जानती तो हूँ ही कि आप इन दिनों अपार कष्टमय दिन बिता रही हैं। फिर भी पूछने की धृष्टता करती हूँ और स्वयं ही एक अपराध-बोध की गिरफ़्त में सहम सी जाती हूँ। 
लगभग पिछले बारह महीनों से आप कैंसर से लड़ाई लड़ रही हैं और इलाज के नाम पर  थोपी जा रही अंग्रेजी, आयुर्वेदिक या होमियोपैथी,  हर तरह की दवाइयों से दो चार होते हुए शरीर-तोड़ व्यथा से भी जूझ रही हैं। आपके भीतर जो उथल पुथल मची हुई होगी और जो दर्द आप सहन कर रही हैं, मैं वो सब कुछ आपके चेहरे पर पढ़ने की कोशिश करती हूँ। मुझे लगता है आप सारा दर्द बताती ही नहीं हैं हमें। लेकिन जो दिल से जुड़े हों, उन से छुपा लेना सरल नहीं होता, हमें पता चल ही जाती है आपकी असहनीय पीड़ा! 

मैं अपने अंतस की गहराइयों से चाहती हूँ कि आपको  इस पीड़ा से विराम मिले और आप पुनः स्वस्थ होकर सुन्दर जीवन जियें। चाहने की सीमा लेकिन  न्यूनतम  दायरा रखती है। मैं हर तरह से कोशिश करके भी आपको स्वास्थ्य देने में विफल रही हूँ और यह विफलता मुझे भी अत्यंत पीड़ा देने वाली साबित हुई है। आपको तुरंत स्वस्थ लाभ प्राप्त करने की कोशिश में  ऐसा भी हुआ कि कई बार हमने बेहद क्रूर हो कर आपको दवा निगलने के लिए मजबूर कर दिया, जिसे आप न चाहते हुए भी निगल जाती हैं। कई बार यूँ भी होता है कि बड़ी ही निर्ममता से आप इंकार कर देती हैं दवा लेने से और तब हम तीनों भाई-बहन आपकी ज़िद के आगे हतोत्साहित हो जाते हैं।   

जानती हो, मेरी कल्पना क्या कहती है? यह कहती है कि किसी तरह आपके तन में प्रवेश कर जाऊं और तुरंत बाहर निकाल लाऊँ उस उद्दण्ड कैंसर रूपी ग्रंथि को जिसने आपको भयंकर कष्ट दिया है! लेकिन दुखद है यह कि मैं ऐसा कर पाने में भी असमर्थ हूँ। 

जब मेरी सभी असमर्थता मेरे समक्ष प्रकट हो जाती हैं, मेरी आँखों के आगे भीषण उत्पात करने लगती हैं, मैं अपनी तमाम कोशिशों से निढाल हो जाती हूँ और तब मैं हार मान कर आपसे कह देती हूँ कि आप अपना बहुत ध्यान रखिये।  ( मन मैं तब यही ​विचार ​आता है कि मैं तो इस लायक भी नहीं कि आपका ध्यान रख पाऊं! )

इस समय बहुत प्यार आपको प्यारी मम्मा!​ 
आपकी गुड़िया 



गुरुवार, 28 अप्रैल 2022

जीवन, बेअंत जीवन

 

जीवन है एक बड़ी नाव , 

सांस छोटी सी नैया। 

जीवन  तैरता रहता है पानी पर
स्थिर कभी, गतिमान कभी। 
दूर तक साये सा दिखता रहता है। 
फिर एक दिन धम् से ग़ायब! 
जैसे कोई चमत्कार। 


साँस आती है, जाती है, 
ओझल हो जाती है, 
पलक झपकने तक कि फुरसत नहीं देती 
कि उसे ठीक से अनुभव कर पायें।
 
जिस क्षण पकड़ में आती है, 
छटपटाहट दमदार देती है, 
मानो अगले ही पल प्राण निकल जायें। 


और वहीं ततक्षण आज़ाद हो 

विलीन हो जाती है अपने राम में! 



उसकी लीला का कोई अंत ही नहीं, 
जीवन भी बेअंत नहीं! 
- पूजानिल 

मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

मेरे प्यारे मोहन भैया





जन्म लेते ही माता पिता, दादा दादी, नाना नानी इत्यादि परिवार के 
सदस्य इकट्ठे ही लगभग प्रत्येक बच्चे को उपहार स्वरूप मिल जाते हैं। 
मेरे पिता का परिवार बड़ा था सो साथ में छह चाचाजी और तीन बुआ जी ​ 
उपहार मिले, ​ दूसरी तरफ माँ के परिवार से तीन मामाजी और तीन मौसीयाँ 
भी उपहार में मिलीं। माँ और पिताजी, दोनों ही अपने अपने 
भाई बहनों में सबसे बड़े थे। 

मैं आज बात करूँगी मुझे मिले एक अनमोल उपहार मेरे तीसरे नम्बर के 
चाचाजी यानी पिता के बाद चौथे नंबर के भाई, हम सब के प्रिय​,​ मोहन भैया की। 
जब हम छोटे थे, तब किसी ने चाचा की जगह भैया कहना सिखा दिया था, 
तब से मोहन भैया और उनसे छोटे तीन चाचाजी को हमने 
हमेशा भैया कहकर ही पुकारा। रिश्ता भी हमने सदैव उसी तरह 
भाई बहन सरीखा निभाया। हम उन्हें राखी बांधते, वे ​ आशीर्वाद स्वरुप ​
हमें गिफ़्ट या पैसा देते। ​ किस्मत से​ बचपन में ​ भरे पूरे  ​संयुक्त परिवार 
में रहने का अवसर मिला जो कि बाद में समय के साथ एकल 
 परिवार में बदल गया। लेकिन जो नहीं बदला, वह था 
हमारा आपस का प्रेम। हम चाहे कितना भी दूर रहे किन्तु 
बचपन वाला प्रेमपूर्ण ​, सौहार्द्र वाला ​व्यवहार सदा कायम रहा। 

मुझसे सत्रह साल बड़े मोहन भैया बड़े ही मनमोहक दिखते थे,
 मोहन नाम के अनुरूप ही मोह लेने वाली atyant सुन्दर सूरत और 
सीरत पाई उन्होंने। ​।जब भी उन्हें देखो तो वे मुस्कुराते हुए ही दिखते।  
पढ़ने में बेहद मन लगता था उनका तथा ईश्वर ने उन्हें कुशाग्र बुद्धि 
प्रदान की थी। कहते हैं कि छठी कक्षा की परीक्षा उत्तीर्ण करने के 
पश्चात् उन्होंने सीधे दसवीं कक्षा की परीक्षा दी थी। घर में हम सभी उनकी 
प्रतिभा का लोहा मानते थे। उनकी हस्तलिपि भी हमेशा अद्भुत सुंदर रही। 
स्वभाव से वे जानकारी एकत्रित करने के शौकीन थे, अत: सवाल खूब 
पूछते थे। मुझे याद है ​ कि वे ​हमें भी पढ़ाई की तरफ प्रेरित करते they।

सम्पूर्ण परिवार में वे हर एक के चहेते तो थे ही, ​ उनकी सलाह प्रत्येक 
कार्य हेतु ज़रूरी थी, साथ ही यदि किसी से दोस्ती करते तो बड़े ही 
जतन और मन से दोस्ती भी निभाते थे। कभी कोई नाराज़ हो जाए 
तो बड़े प्यार से हंस कर मना लेते उसे। मिल बाँट कर हँसते हँसते 
ज़िंदगी जीने का हुनर सिखाते थे मोहन भैया। योग करने के लिए न 
सिर्फ स्वयं कदम आगे बढ़ाते बल्कि दूसरों को भी प्रेरित करते। 
मेहनती इतने कि दुकान के कामकाज के अलावा प्रतिदिन समाज सेवा 
के काम के लिये भी तन मन धन से जुटे रहते। अपने परिवार के साथ 
समय बिताने में भी पूरी लगन से आगे रहते। इतना काम करने का 
नतीजा यह होता था कि कभी कभी हम सबसे बात करते करते 
ही उन्हें कहीं भी नींद आ जाती थी, फिर अचानक से उठ बैठते 
और पूछते कि जो बात चल रही थी, उसका क्या हुआ! 
उनकी इस भोली सी अदा पर हम सब हंस पड़ते थे। 

उनके किस्से परिवार तक सीमित नहीं थे। व्यापार हो, बैंकिंग हो, 
घूमना फिरना, पिकनिक, पारिवारिक भोज की व्यवस्था हो या 
समाज में जुलूस का प्रबंध करना या फिर अखबार में समाचार 
देने की व्यवस्था करना हो, प्रत्येक कार्य को ऐसी कुशलता मगर इतनी 
सहजता से कर देते कि लगता यह केवल उनके ही बस की बात थी। 
घर परिवार में किसी को कोई समस्या आ जाए तो आधी रात उठकर 
भी मदद करने को चल देते थे। वे बच्चो के साथ बच्चा बन जाते और 
बड़ी सरलता से उन्हें भी दोस्त बना लेते। ​यहाँ तक कि ​​वे जब स्वयं 
​नाना बने तो नन्हे से नाती को भी अपना दीवाना बना दिया। ​

वे जब 80 के दशक में बिज़नेस ट्रिप से सिंगापुर घूमकर लौटे तो 
हमारे लिए बड़े ही आकर्षण का केंद्र बन गए। इतनी बड़ी टी वी लाए 
वहाँ से कि उस ज़माने में कभी हमने सोची भी न थी। ​हर तरफ उनकी 
विदेश यात्रा की चर्चा होती और हम बड़ा गर्व 
अनुभव करते कि ये हमारे अपने मोहन भैया हैं। ​

​जब ​हम बड़े हुए, ​तो ​पिता जी की अनुपस्थिति में हम हर काम में 
उनकी सलाह लेते। मेरी शादी में भी उनका आशीर्वाद मिला। बाद में ​ 
मेरी ससुराल में फोन करके ​मेरा हाल चाल हमेशा लेते थे वे।
मेरे​ ​मेड्रिड आने के बाद भी मेरे निरंतर संपर्क में रहे मोहन भैया,
पत्र या ईमेल ​ भी ​लिखते थे।

​जब मैं ​मद्रिद से उदयपुर लौटती तो ऐसी प्रसन्नता से वे सुबह शाम 
मुझसे मिलने माँ के घर आते थे, कि पिता की कमी महसूस न होने देते कभी। 
मन ऐसा जुड़ा था उनसे भावनात्मक स्तर पर कि पिता और 
बेटी जैसा ही संबंध अनुभव होता है मुझे। 

तब उन दिनों में भी, जब विदेश फोन करना बडा ही खर्चीला हुआ 
करता था ​तब भी एक ​पिता की तरह जिम्मेदारी निभाते हुए मुझसे फोन 
पर बात करते रहते थे, और तब भी जब व्हाट्सएप्प जैसी सुविधा मिल 
गई​ तो भी बात हुआ करती उनसे​। ​संयोग से आखिरी बार अपने दुनिया से  
कूच करने से एक दिन पहले ही उन्होंने मुझसे बात की थी। 

मेरे पिताजी को बहुत जल्दी ईश्वर ने अपने पास बुला लिया था। 
2020 में माँ भी वहीं चलीं गईं। और अब मोहन भैया भी अपने 
भाई भाभी के संग हो लिये। गुरुवार 21 अप्रैल की शाम को मंदिर 
में प्रणाम करने को नतमस्तक हुए तो वहीं ईश्वर को समर्पित हो गए। 
आत्मा का परमात्मा में विलीन होने का इस से अच्छा क्षण क्या होगा 
कि प्रभु को स्मरण करते हुए ही प्रभु से जा मिलें! इस विदा होने से 
एक दिन पहले ही उन्होंने मुझे कॉल किया था और पौन घंटा 
क़रीब बात करते रहे। कह रहे थे कि इलाज से अब आँख की रोशनी 
लौट रही है तथा वे जल्दी ही आँखों के डॉक्टर से मिलने दिल्ली जाएँगे। 
तब यह पता भी न था कि वही उनसे अंतिम बातचीत होगी। 
अब उनकी राह में रोशनी ही रोशनी होगी, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ 
डॉक्टर के पास जो पहुँच गये हैं मेरे प्यारे भैया। हमारे पास अब उनकी 
अनन्त यादें बाकी हैं, जिनके जरिये वे हमारे साथ हर पल बने रहेंगे। 
हाँ, अपनी ढेर सारी जिज्ञासाओं के साथ वे अब वहाँ ईश्वर से खूब सवाल कर रहे होंगे। 

मेरे सबसे छोटे चाचाजी ने बताया कि मोहन भैया की दृष्टि बाधित होने 
के बाद किसी दिन वे मंदिर जा रहे थे तो किसी ने उनसे कहा कि कुछ दिखता 
तो है नहीं, आप क्या करोगे मंदिर जाकर? 
तब मोहन भैया ने बड़ी सहजता से 
मुस्कुराकर जवाब दिया कि, “ मैं नहीं देख सकता 
मगर भगवान तो मुझे देख सकते हैं न!” 
तो ऐसे थे वे धुन के पक्के और दृढ़ विश्वास से भरपूर। 

यह सब लिखते हुए ​बार बार ​आँसू उमड़ रहे हैं। 
एक और बार, पिता से बिछड़ने का दुख झेल रही हूँ। 
आपकी अपनी दो बेटियों के अलावा यह बेटी भी आपको 
खूब याद कर रही है मोहन भैया! 
मो​बेश मेरे जैसी ही स्थिति परिवार में सबकी है। 
इतने अपने हो आप मोहन भैया कि सदैव सदैव दिल में रहोगे। 
-पूजानिल​ 
































शुक्रवार, 18 मार्च 2022

शुभ होली

 शुभ हो पर्व रंगों का 

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गुलाबी नीला मन लाल जामुनी, 

निराला बडा चटक माह फागुनी।  

भेज रहे उनको मन ही मन संदेश 
रहते हैं जो प्रिय, किसी दूर देश।  
थोडा सा मन को मीठा कर लेना
बीते दिनों का रिश्ता याद कर लेना। 
मां बाबा अब साथ नहीं हैं तो क्या, 
आशीष से उनके दामन भर गया। 
अजब अद्भुत रंगों की रंगोली हो 
हर दिन प्रेम प्यार की होली हो। 
—————-
शुभ हो रंगोत्सव। 
🌈🌺🌸🌼🔵💚🌈🥰
-पूजानिल

सोमवार, 14 जून 2021

संस्मरण - माँ की रोटी

 मेरी डायरी से अंश-


                                         




''संस्मरण - माँ की रोटी''

बात जनवरी 2018 की है। अमूमन जनवरी महीने में मेरी भारत यात्रा होती नहीं है, लेकिन उस साल किसी कारण जनवरी के महीने में एक सप्ताह के लिए मैं अकेली ही भारत गई थी। मेरी फ्लाइट उदयपुर पहुंची देर शाम को। एयरपोर्ट से निकल शहर की सड़कों पर कुछ नए, कुछ पुराने दृश्य देखती हुई मैं जब भाई के साथ घर पहुंची तो माँ दरवाजे पर ही प्रतीक्षा करती खड़ीं थीं। वे लगभग दौड़ कर नजदीक आईं और ख़ुशी की आवाज़ में ''गुड़िया'' कहते हुए मुझे गले लगा लिया। यह जो दृश्य था, जब भी मैं भारत जाती और माँ के घर पहुँचती तब हर बार कमोबेश ऐसा ही हुआ करता था। यहाँ तक कि मुझे भ्रम होता था कि मैं राम हूँ और माँ अहिल्या बनी वहीं सदियों से मूर्तिवत मेरी प्रतीक्षा करती रहती हैं कि कब मैं पहुँचूँ और कब वे मुझे गले लगा कर अपनी तपस्या को पूर्ण होते देखें! । इसके विपरीत, सच कहती हूँ, दरवाजे पर माँ के मुख से मेरे नाम की पुकार सुन लेना और उनका मुझे गले लगा लेना -  ''इतना'' हो जाना ही मेरी भारत यात्रा को सफल बनाने के लिए पर्याप्त था (अब ऐसा दृश्य पुनः कभी नहीं होगा)! 

घर में प्रवेश करते ही माँ के साथ बातों का पिटारा खुल गया था, बहन भी वहाँ आ गई थी, हम सब एक साथ मिल गए तो खाने पीने का ध्यान ही नहीं रहा। बहुत सी बातें करते करते अँधेरा होने लगा  था। माँ ने कहा कि ''अब देर हो गई है, बातें तो चलती रहेंगी, पहले कुछ खा लो!'' तब मैं उठ कर जल्दी से गरम पानी से नहा आई। (उदयपुर में सर्दी रहती है जनवरी  महीने में, तब गरम पानी से नहाना ही रुचिकर लगता है )

 इस बीच माँ ने गरमा गरम चपाती बना दी। दूसरी तरफ कड़ाही में आलू भिंडी बनाने को रख दिए। मगर माँ के हाथ से बनी चपाती की खुशबू और करीब दो दिन की हवाई यात्रा की थकान ने इस बीच भूख पूरी तरह जागृत कर दी थी। और मैंने माँ से कहा कि ''आप तो बस कोरी चपाती ही खिला दो जल्दी से।'' यह बताना बहुत ज़रूरी है कि उनकी कोरी चपाती का भी एक अलग ही रस लगता है मुझे, (बिना नमक की उनकी रोटी ऐसी कि हर तरफ से एक समान पकी हुई, न सख्त और न ही नरम, तिस पर एकदम रसीला स्वाद) और हमें इतनी पसंद थी वह कि बहुत बार ऐसा होता था कि हम भाई बहन उनके हाथ की बनी चपाती बिना सब्जी के ही खा जाते थे।  संभवतः किसी को यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हो किन्तु पूर्णतः सत्य है यह और यह बात केवल मैं ही नहीं कहती बल्कि जिन लोगों ने भी मेरी माँ के हाथ की बनी चपाती खाई है वे सभी गवाही देंगे कि मेरी माँ के हाथों से बनी चपाती का पूरी दुनिया में कोई सानी नहीं। मैंने दुनिया भर का खाना खाया है लेकिन माँ के हाथ की चपाती जैसा स्वाद आज तक कहीं नहीं मिला है। मैंने उनसे ही सीखा है किन्तु मैं ठीक वैसा नहीं बना पाती। पता नहीं कैसे बनाती थीं वे कि सादी चपाती का स्वाद भी छप्पन भोग पर भारी पड़ता था!! (अब हमें ऐसा स्वाद भी पुनः कभी नहीं मिलेगा)! 
 
खैर, मेरे कहने पर माँ सादी चपाती ही ले आई। मैं भी पालथी मार कर जम कर बैठ गई। वे आकर मेरे पास बैठीं, थाली से रोटी का निवाला/ कौर तोड़ कर उन्होंने मुझे अपने हाथों से खिलाना शुरू कर दिया (अब इतने बड़े हो चुके बच्चे को कौन इतना प्रेम करेगा कि अपने ही हाथ से खाना खिलाये!) !  पहला निवाला मुख में लेते ही जो स्वाद आया कि तृप्ति का भाव उमड़ आया और भावनाओं के अतिरेक में आँखों में आँसूं  तैर आये। मैं अपने आँसूँ रोक नहीं पा रही थी और माँ का प्यार भी छलकता जा रहा था। मेरा मन इतना भर आया कि भीगे नेत्रों की ख़ामोशी में मैंने भी रोटी का निवाला तोड़ कर माँ को खिलाना शुरू कर दिया। माँ कहती रहीं कि तू तो खा ले पहले, लेकिन रुंधे गले से मैंने कहा कि आप भी तो खा कर देखो कि कितनी स्वादिष्ट रोटी है! माँ बेटी के आंसुओं से भीगी वो रात भी पूरी तरह भीग गई होगी! बस, निःशब्द उस स्वाद को जी रहे थे हम! (अब ऐसा मिलन भी पुनः कभी नहीं होगा)

रोटी का रसीला स्वाद हो गईं,
हर दिन की अब याद हो गईं,  
माँ कल तक बस मेरी माँ थीं, 
भू, जल, नभ, आकाश हो गईं! 

नोट - माँ का साथ छूटे आज पूरा एक साल बीत गया। बहुत से बहुत अधिक याद आती हैं माँ।
-पूजा अनिल 

  

गुरुवार, 15 अप्रैल 2021

सुरक्षा आपके अपने हाथ है

 डॉक्टरस अपने नैतिक धर्म के तहत विनती कर रहे हैं कि घर में रहें, अपना ध्यान रखें और भीड़ का हिस्सा न बनें। लोकल प्रशासन भी अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है कि शहरों में कर्फ़्यू लगा दिया, पाबंदी लागू कर दी, सामान्य गतिविधि के लिये भी समय सीमा और जगह निर्धारित कर दिये। 

जनता भी किसी तरह पीछे नहीं रही, मेसेज शेयर किये, एक दूसरे को सलाह दी, बातों ही बातों में दुख प्रकट किया, कोरोना पीड़ितों को  सांत्वना के दो शब्द भी कहे। 

लेकिन कोई तो है जो इस सब के बावजूद अनजाने ही कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं, साथ ही अनजाने ही दूसरों को भी संक्रमित कर रहे हैं। वह कैसे? संभवत: मास्क नहीं धारण किया हो! या फिर दो मीटर की दूरी न बनाये रखी हो!! या फिर संक्रमित हाथोँ से अपने नाक मुँह / आँख छू लिये हों!! या फिर जान बूझ कर उतर पड़े हों मैदान में कोरोना राक्षस से दो दो हाथ करने की मंशा से!! कौन जाने सच्चाई!!यह  हम तो नहीं जानते!! हाँ, यह ज़रूर समझ लिया है कि यदि आप मौक़ा देंगे तो कोरोना रूपी असुर आपका आतिथ्य स्वीकार कर बड़ा प्रसन्न होगा। एक के बदले दस बीस के यहाँ मुफ़्त मैं जीमने का मौक़ा मिलेगा तो कोई भला क्यों न प्रसन्न होगा!!! 

धन्य हैं वे लोग जो असुरों के प्रति सद्भावना रखते हैं और मित्र, परिवार तथा अपनों के साथ स्वयं अपनी भी आहुति देने में बिलकुल पीछे नहीं हट रहे हैं। कोरोना को तो ऐसे ही लापरवाह लोग बहुत पसंद हैं।इनकी मनमर्ज़ी से  मज़े ले ले कर उसकी तो जीवन नैया वेग से चल रही है। 

लेकिन हे मानव जन! जीवन तो तुम्हारा ही लील गया यह!!  तुमको ही खाकर तो पल बढ़ रहा कोरोना! क्या कहा? पता नहीं चल रहा कि कहाँ छुप कर वार कर रहा दुश्मन? तो सबसे अचूक उपाय यही है कि श्रीमान जी/ श्रीमती जी  तुम भी घर मैं छुप जाओ न! तुम क्यों मैदान में कूद कर उसकी खुराक बन रहे हो? बोलो? 

चलो, माना कि तुमको देश की परवाह नहीं, शहर की भी नहीं, समाज की नहीं, परिवार की भी नहीं, तो कम से कम अपनी खुद की तो परवाह कर लो जी!! 

-पूजानिल