रविवार, 25 अक्टूबर 2026

माँ के बहाने चाँद

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माँ के बहाने चाँद 


चाँद रोए तो क्या धरती भीगेगी? 
मेरी ज़मीन की मिट्टी 
जो बंजर सी दिखती है, 
क्या चंद्र नयन जल से तृप्त हो, 
फलों के बग़ीचे उपजाएगी? 
शिशिर  ऋतु में, 
माँ के कहने पर, 
रखी थी खीर शरद पूर्णिमा 
की चाँदनी में, 
खीर में चाँद का पीलापन 
बचा रहा, 
मैंने वह अमृत पेय माँ को 
समर्पित किया और 
चाँद को भेजा अश्रु जल, 
क्या चाँद वहाँ भीगा होगा? 
-पूजा अनिल 

शनिवार, 30 मई 2026

भूने हुए धरतीवासी

 आज प्रकाशित हुए मेरे इस लेख पर बड़ी विचारणीय टिप्पणियाँ मिल रही हैं। आप भी पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दीजिए। 


https://dainikhindinews.com/प्रदेश/संपादकीय-भूने-हुए-धरतीवा/ 


https://www.allrightsmagazine.com/editorial-roasted-earthlings-pooja-anil/ 


https://iycnews.in/संपादकीय-भूने-हुए-धरतीवा/ 


Sonu Kumar को हार्दिक धन्यवाद इस आलेख को विभिन्न समाचार पत्रों तक पहुँचाने और प्रकाशित करने के लिए। 




शनिवार, 18 अप्रैल 2026

यूरोप में नारी सशक्तिकरण- पूजा अनिल

गृहस्वामिनी पत्रिका

 मुझे यह बताते हुए अत्यंत प्रसन्नता हो रही है कि गृहस्वामिनी पत्रिका के नेक्स्ट जेन स्त्री पर आधारित अप्रेल जून 2026 अंक में मेरा महिला सशक्तिकरण के लिए यूरोप की महिलाओं द्वारा किए गए संगठित प्रयासों  पर एक आलेख प्रकाशित हुआ है। इसे प्रकाशित करने के लिए गृहस्वामिनी पत्रिका एवं संपादक मंडल को हार्दिक धन्यवाद। 

इस लिंक पर आप भी पढ़ें और अपने विचार हमसे साझा करें। पत्रिका का लिंक अन्य पाठकों तक भी पहुँचाएँ। 


https://www.grihaswamini.com/magazines/

गुरुवार, 8 जनवरी 2026

52 की उम्र में तीसरी मास्टर्स डिग्री

 

K K Sadhwani 

साल 1994 की बात है। एक दिन मेरे पापा (श्री कृष्ण कुमार साधवानी/ के के साधवानी) ने हम सबसे कहा कि उनके पास एम ए की डिग्री है, एम कॉम की डिग्री है और अब एम एस सी की डिग्री प्राप्त करने के लिए उन्हें केवल एक साल की पढ़ाई करनी है। शिक्षा एवं ज्ञान को लेकर उनकी आधुनिक सोच किसी से छिपी नहीं थी। हमें भी वे शिक्षा के प्रति जागरूक करते रहे, उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते रहे थे। 

 एम एस सी प्रीवीयस एग्ज़ाम वे क्लीयर कर चुके थे। लेकिन कुछ ऐसी दुर्घटनाएँ घटित हुईं कि उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा था और इसी कारण वे एम एस सी फ़ाइनल की तैयारी नहीं कर पाए थे।

 उनकी बात सुनकर सबने कहा रहने दीजिए, अब आप 51 बरस के हैं और अब कहाँ इतना परिश्रम करेंगे! इस बात पर उनका उत्साह जरा भी कम न हुआ बल्कि बड़े उत्साह से उन्होंने बताया कि यदि उन्होंने यह डिग्री भी हासिल कर ली तो यूनिवर्सिटी उन्हें डॉक्टरेट प्रदान करेगी और वे चाहते थे कि उन्हें डॉक्टरेट प्राप्त हो, इसीलिए वे पढ़ाई कर रहे थे।

 फिर उनकी यही बात मुझे भी बेहद उत्साहित करने लगी कि पापा 51 की उम्र में तीसरी मास्टर्स  डिग्री हासिल करने के लिए बेकरार थे। इस उम्र में उनके अधिकांश मित्र पढ़ने पढ़ाने से कोसों दूर हो चुके थे। लेकिन उनका ऐसा बच्चों जैसा उत्साह देखकर मैंने कहा ऐसी बात है तो आपको अवश्य पढ़ाई करनी चाहिए। पापा ने कहा कि मैं करना चाहता हूँ किंतु मुझे तैयारी करने का समय ही नहीं मिल रहा है। ऑफिस में सुबह से शाम निकल जाती है और शाम को घर आने तक मैं इतना थक जाता हूँ कि मोटी मोटी किताबें पढ़ कर नोट्स बनाना मेरे लिए बहुत कठिन है। यदि तुम लोग मेरी मदद कर दोगे तो मैं बड़ी खुशी से यह परीक्षा दे दूँगा।

 हम हैरान हुए कि हम कैसे मदद करेंगे? पापा ने कहा कि मैं तुम्हें किताबें ला कर दूँगा, तुम पढ़ कर मेरे लिए नोट्स बना कर तैयार कर देना और शाम को मुझे पढ़ा देना। लेकिन यह कैसे होगा? 

मैं तब एम एस सी प्रीवीयस ज़ूलोजी में कर रही थी। पापा स्टेटेसटिक्स में पढ़ाई कर रहे थे! दोनों विषयों का कोई मेल नहीं। पापा की कही बात मैं कभी टालती नहीं थी। प्रश्न तो थे लेकिन थोड़ी देर उनसे सवाल जवाब कर के मैंने उनके प्रस्ताव पर सहमति दे दी। 

अगले ही दिन वे अपने कोर्स से संबंधित दो किताबें ले आए और मुझे सौंप दीं कि इनमें से तैयारी करनी है। मैं सुबह अपनी कक्षा में जाकर पढ़ती थी और दोपहर के बाद घर लौट कर पापा की किताबें पढ़ती और नोट्स तैयार करती थी। जितना कठिन मैंने सोचा था, वह उतना कठिन नहीं था। मेरे विषय से भिन्न था, इसलिए पढ़ने समझने में अधिक समय लगता था लेकिन मैं लगातार तैयारी करने लगी थी तो अब वह पढ़ाई भी मेरे जीवन का हिस्सा बन गई थी। 

जो कुछ मैंने पढ़ा होता था वह हर शाम को मैं पापा को पढ़ा देती। पापा भी एक अच्छे विद्यार्थी की भांति पूरे मन से पढ़ते। कोई सवाल होता तो मुझसे पूछते थे। इस तरह मैंने पापा को उनका पूरा कोर्स पढ़ा कर तैयार करवा दिया और अपने स्वयं की परीक्षा भी तैयार कर ली। 

साल 1995 में पापा ने परीक्षा दी,जहां तक मुझे याद है संभवतः सितम्बर 1995 में रिज़ल्ट आया था और वे  बहुत अच्छे मार्क्स से पास हो गए थे। हम सब बहुत खुश थे कि अब पापा के पास तीन तीन मास्टर डिग्री हो जाएंगी। और पापा को डॉक्टरेट भी मिल जाएगी। 

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 8 जनवरी 1996 यानी आज से 30 साल पहले पापा को ह्रदयाघात हुआ और वे डॉक्टरेट लिए बिना ही 53 साल की छोटी सी आयु में इस दुनिया से चले गए। 

शिक्षा के प्रति उनका लगाव और समर्पण, न केवल परिवार में बल्कि हमारे पूरे समाज में हमेशा एक प्रेरक उदाहरण रहा। आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके आदर्श और उनकी प्रेरणा सदा हमारी मार्गदर्शक बनी हुई है। ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व दुनिया में कम ही होते हैं, मेरे पापा उनमें से एक हैं जो अपनी आधुनिक विचारधारा से समाज के उत्थान के लिए समर्पित रहे। मुझे गर्व है कि मैं उनकी संतान बन कर इस दुनिया में आई। 

आज उनकी तीसवीं पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करते हुए हम उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आप सदैव हमारे दिल में निवास करते हैं पापा।
-पूजा अनिल 


सोमवार, 10 नवंबर 2025

फिल्म समीक्षा के बहाने

 


2022 में एक हिंदी फिल्म आई थी “शेरदिल- द पीलीभीत सागा”। 

संभवतः उस समय पता नहीं चला होगा, लेकिन अब 2025 में नेटफ़्लिक्स पर यह फिल्म दिखी तो देखने बैठ गए। 
कहानी एक गाँव के सरपंच की है जो अपने गाँव की भुखमरी मिटाने के लिए स्वयं को मिटाने के लिए तैयार हो जाता है। स्वयं को मिटाने के लिए वह बाघ के सम्मुख जाने का निश्चय करता है ताकि बाघ उसे मार डाले और उसके गाँव वालों को दस लाख रुपए का मुआवजा मिल सके। बाद में फिल्म का अंत बड़ी अप्रत्याशित घटना के साथ होता है। 
कहानी बड़ी रोचक है और गाँव के माहौल को बड़ा जीवंत दिखाया गया है। उनकी वेशभूषा, रहन सहन, भाषा, परिवेश, शहरी संस्कृति की अज्ञानता आदि सब कुछ सुंदर बुना गया है। दुख में रचे गए कॉमेडी दृश्य इसे बोझिल होने से बचा लेते हैं और दिलचस्प बनाए रखते हैं। 

पूरी भाव प्रधान फिल्म में मन में यह सवाल उठता रहा कि क्या कोई ऐसा बलिदान दे सकता है कि गाँव के लोगों की जान बचाने के लिए स्वयं की जान पर खेल जाए?
और हमें इसका उत्तर अंततः मिला। फ़िल्म के समापन पर यह लिखा हुआ आया कि यह फ़िल्म साल 2017 की एक सच्ची घटना पर आधारित है जब गाँव के लोग जंगल में चले गए ताकि बाघ उन्हें मार दे और गाँव वालों को पैसा मिल सके और उनकी ग़रीबी दूर हो सके। 
अब यह सत्य जानकर पूरी घटना दुखदायी लगने लगी। फिल्म की कॉमेडी भी अत्यंत दुखद प्रतीत हुई। भारत में धन की कमी नहीं है लेकिन साल 2017 की आधुनिक दुनिया में भूख से पीड़ित लोग आत्महत्या का मार्ग चुनने लगें तो प्रश्न उठता है कि रोज टनों अन्न कचरे में फेंकने वाले देश में लोग भूख से मरें, क्या यह शर्मनाक बात नहीं है? 
सरपंच के रोल में पंकज त्रिपाठी शहरी ऑफ़िसर के आगे हाथ फैला कर कहते हैं कि सरकार ने जो स्कीम उनके लिए बनाई है वो स्कीम उन्हें दे दें तो उस स्कीम को गाँव ले जाकर गाँव वासियों की भूख मिटाने का प्रबंध हो। पीड़ादायक बात यह कि कोई सरकारी स्कीम नहीं मिल पाई उसे। 
अनाज से भरपूर आज की दुनिया में कम से कम इतना तो अवश्य होना चाहिए कि कोई व्यक्ति भूख से न मरे! वैज्ञानिक पद्धति से खेती, सिंचाई के साधन, उपज स्टोर करने के नए तरीक़े, उन्नत तकनीक और आधुनिक कृषि उपकरणों का उत्पादन बढ़ाने के लिए उपयोग, आदि  से फसलों की पैदावार बढ़ी है किन्तु गरीब लोग इस अनाज के हकदार नहीं? ऐसा क्यों? 
-पूजा अनिल 

रविवार, 9 नवंबर 2025

सपने या सच्चाई?

 किसी डाल पर सपने बैठे, किसी डाल पर सच्चाई, 

आँख खुली तो उड़ गए सपने, बची रह गई सच्चाई! 


साँसों की माला अद्भुत है, जो देती नहीं दिखाई, 

हर क्षण धारण करके फिरती जीव आत्मा साईं। 


दर दर भटकते मांगे भिक्षा, कुछ पैसा दे दो भाई, 

ईमानदारी से करें परिश्रम, पाएँ मेहनत की कमाई। 


चीं चीं चूँ चूँ कर झूठे वादे, जनता गई भरमाई, 

भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट अधिकारी सबने इज़्ज़त गँवाई। 


धूप की तेज़ी, हवा की सरसर, तन को छूती माई, 

तेरे आँचल का स्नेह ओढ़ मेरे मन ने छैंया पाई। 


जिसकी जिव्हा पे “हरि नाम” पावन धुन है समाई, 

मीठे उसके वचन जैसे हो माखन मिसरी खाई। 

-पूजा अनिल 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

क्या भूलें क्या याद करें

 ये जिंदगी का फ़लसफ़ा बड़ी अजीब शय है बाबू मोशाय! 

जीने की बात पर मरना याद आता है, 

ठहाकों के बीच रोना याद आता है, 

जमीन पर चलते हुए आसमान याद आता है,

खुद को भूलो तो खुदा याद आता है, 

गुनगुनाओ तो दिल का हाल जुबां पर खिसक आता है, 

कॉफी पीते हुए वो अपना सा दोस्त याद आता है , 

किताब पढ़ते हुए लिखने वाले का अक्स दिख जाता है, 

फूलों के साथ बैठो तो सुकून ओ क़रार आ जाता है, 

चिट्ठी लिखने से पहले पाने वाले का न भूलने वाला चेहरा याद आता है,

दिल खोलकर रख दो तो कोई दिलफरेब याद आता है, 

मोहब्बत की बात करो तो केवल ग़म याद आता है, 

हम कब के गुज़र गए होते अगर जिंदगी के ये हसीन ओ अजीब एहसास न होते! 

- पूजा अनिल