शनिवार, 28 सितंबर 2019

कहानी - नया जन्म लेना

नया जन्म लेना   

 नीकोनीको!!! उठो न जल्दी!
क्या हो गया लोलीक्यों सुबह सुबह शोर कर रही हो डिअर? - नीकोलास ने आँख जबरन खोलते हुए हैरानी से पूछा। 
यहाँ आओ न! हम मम्मी-पापा बनने  वाले हैंदेखो तो!! - लोलीता  ने अपनी बात पर ज़ोर देते हुए ख़ुशी में चिल्ला कर कहा। 
क्या? - नीको को बात पसंद नहीं आई। 
हाँ यारसुनो नापॉजिटिव है रिजल्ट! - लेकिन लोलीता  की ख़ुशी का अंत न था। 
तुमने इस बार भी कंट्रासेप्टिव नहीं लिया न? - नीकोलास का स्वर बुझा बुझा था। 
नीकोतुम जानते हो नमुझे अब एक बच्चा चाहिए। - लोली के स्वर में दृढ़ता थी। 
तुम पागल हो गई हो लोला! - अब तक छुपा हुआ नीको का गुस्सा अब शब्दों में झलक आया। 
मैं नहींतुम पागल हो गए हो नीकोहर बार इनकार कर देते हो! -इतनी सी झिड़कियों से लोली का मिजाज़ भी बदल गया और दोनों के बीच गुस्सा अब तक़रार पर उतर आया। 

तो और नहीं तो क्या करूँतुम जॉब में बिजी होमेरा भी अभी अभी प्रमोशन हुआ हैमैं खुद नए,  प्रोजेक्ट में लगा हूँबच्चे को कौन संभालेगाकुछ तो प्रैक्टिकल सोचो! 

देखोदस साल पहले यह बात कहते अगर तुम तो मैं सोच में पड़ जातीपर अब मुझे सत्रह साल से ज़्यादा हो गए यार इसी जॉब में! छह महीने मेटरनिटी लीव  भी आराम से मिल जाएगी और बच्चे को समय देने की भी कोई दिक़्क़त नहीं होगी!

तुम तो दस साल पहले भी बच्चा चाहती थीवो तो मैंने ही रोक लिया था तुम्हे!
तो तुम क्या चाहते होअबो्र्ट कर दूँ इसे भी?
मेरी उम्र ही क्या है अभी!! तैंतीस साल में मेरे लिए अभी अपना कैरिएर बनाने का समय है यारतुम समझती क्यों नहीं?
और मेरी उम्रतुम्हें नहीं मालूम कि इस साल जून में चालीस की हो जाउंगी मैंक्या तुमने नहीं देखा कि  पूरी जवानी काम किया है मैंनेयह घर मैंने अपनी मेहनत की कमाई से बनाया है. यह कार लिए जो तुम शान से घूमते होवो भी मैंने अपनी कमाई से ली हैसाल में जो चार यूरोप ट्रिप करते हो तुम मेरे साथउसका सारा खर्च भी मैं ही उठाती हूँ. आधा जीवन समर्पित कर दिया तुम्हारे लिए मैंनेऔर अब जब मैं एक ख़ुशी चाहती हूँतो तुम मुझे हज़ार बहाने दे रहे हो!
ऐसी बात नहीं करिन्यो! मैं बस थोड़ा सा समय और चाहता हूँ। 
अच्छा! तुम्हें समय चाहिएपर मैं कहाँ से लाऊँ समयअपनी गायनेक से मिली थी मैंउसका भी कहना है कि अब हाई टाइम है! 
तुम साल दो साल नहीं रुक सकती मेरी जानफिर तुम जैसा कहोगीवैसा ही करूँगा मैं। पक्का! तब तक मेरा एल्बम भी रिलीज़ हो जायेगा यार! - नीकोलास कुछ शांत स्वर पर उतर आया। 
नहीं रुक सकतीबिलकुल नहीं। तुम्हारे साल दो साल के चक्कर में पहले ही  मैं दो एबॉर्शन करवा चुकी हूँ नीको! अब और नहीं। तुम चाहो तो अपनी अलग दुनिया बसा सकते हो। मैं अकेली ही अपना बच्चा पालने में पूरी तरह समर्थ हूँसमझे?
तुम सच में पागल हो गई हो लोलाएक बच्चे के पीछेजो अब तक इस दुनिया में आया भी नहींउसके लिए तुम मुझे छोड़ने को तैयार होजबकि हम चौदह साल से एक दूसरे को जानते हैं और एक दूसरे के साथ हैं!!
तुम यह बात क्यों नहीं समझते कि बच्चा एक भावनात्मक सुरक्षा प्रदान करता हैबच्चे की हंसी किलकारी घर में एक अनोखी ख़ुशी भर देती है। बच्चा माँ और पिता को और नजदीक लाने का जरिया बनता है। बच्चा दो परिवारों को जोड़ने का सेतु बनता है! और सबसे महत्त्वपूर्ण यह कि बच्चों से ही मानव वंश आगे प्रसारित होगा!!
मैं कब इस सब से इंकार करता हूँ मेरी जानबस थोड़ा वक़्त ही तो मांग रहा हूँ तुमसे!
मैंने तो अपना पूरा वक़्त दिया है तुम्हे निकोलास। याद हैजब तुमने यूनिवर्सिटी की पढाई शुरू कीतभी से तुम मेरे साथ आकर रह रहे होमैंने इस सारे वर्षों में तुम्हारी हर एक ज़रूरत पूरी की। पढाई पूरी होने तक मैंने तुम्हारे लिए सारी सुख सुविधा जुटाईयहां तक कि  तुम्हे नौकरी दिलवाने के पीछे मेरे कितने ही कॉन्टेक्ट्स तुम्हारे काम आयेतुम्हारे प्रमोशन के लिए भी मैंने अपने सीनियर्स से सिफारिश करवाई। यह सब क्या तुम्हे समय देना नहीं थाबोलो

अब यह सब गिनवा कर तुम मुझ पर एहसान जता रही होकसैलेपन और अपराधबोध से भर उठा नीको। 

बिलकुल! एहसान किया है मैंने तुम पर।  याद करो वो दिनजब लगातार मिलती नाकामी से दुखी थे तुम और निराश हो चुके तुम्हारे माँ बाप ने तुम्हे घर से निकाल दिया था और तुम अपना एक बैकपैक और गिटार लिए पब में दोस्तों के सामने रो रहे थे। जब कोई तुम्हे शरण देने को तैयार नहीं थातब तुम्हे उठा कर अपने साथ ले आई थी मैं।  उस अप्रिय क्षण को कैसे भूल सकते हो तुमसाथ ही उस पल तुम पर की गई कृपा को कैसे भूल सकते हो तुम? - लोली का अहंकार उभर आया उस क्षण में। 

मुझे नहीं मालूम था कि एक दिन तुम उस एहसान को इस तरह जताओगीवर्ना मैं कभी तुम्हारे साथ नहीं आया होता! - गहराता अपराधबोध अब क्रोध में परिवर्तित हो रहा था। 

हद्द है यार! किसी ने तुम्हारा जीवन संवारने के पीछे अपना जीवन समर्पण  कर दिया और तुम उसे ही ताना मार रहे हो? - अहंकार और संवेदना की सीमायें गड्ड मड्ड हो गईं। 

अच्छा!! तो तुम्हे यह लगता है कि तुम न होती तो मैं अब तक सड़कों पर भीख मांग रहा होताकोई ग़लतफ़हमी मत रखोमैं अच्छे से अपनी काबिलियत पहचानता हूँ और तुम्हारे बिना भी अपना जीवन जी सकता हूँसमझी?

ओह्ह रियलीतुम आज ही अपना सामान यहां से ले जा सकते हो आलसी निकोलास! और सुनोपलट कर कभी मुझे अपना मुंह मत दिखानाएहसान फरामोश! - विरले ही लोलिता किसी से इस तरह नाराज़ होती थी। 

नीकोलास भी इस समय की बहस से तंग आ गया और उसने ताव में अपना सामान बांधना शुरू कियासाथ ही दोनों की बड़-बड़ चलती रही।  दोनों की सुबह इस बहस में बर्बाद हो चुकी थी।  शनिवार सुबह थीअतः दोनों को ही ऑफिस नहीं जाना था। सामान बाँध जैसे ही नीकोलास ने कार की चाबी उठाईलोला ने गुस्से में उसे चाबी वहीँ रखने का आदेश दे दिया। 

बात सच भी थीघर भी लोला का थाकार भी उसी की।  नीकोलास के पास कुछेक नक़ल की हुई धुनों और उसकी सुस्ती के अलावा अपना कहने को कुछ भी न था।  इतनी मेहनत करने की उसने कभी फ़िक्र ही नहीं की थी कि अपने लिए कुछ जोड़ सके।  सारे ऐशो आराम हासिल थे उसे लोला के साथ। उसे तो बस गिटारिस्ट बनने  की धुन सवार थी।  सो उसने एक म्यूजिक ग्रुप ज्वाइन कर रख था।  पर उस ग्रुप के साथ उसका जेब खर्च भी नहीं निकलता था।  तब लोला ने ही उसे एक म्यूजिक स्कूल में जॉब दिलवा दी थी। 

मेड्रिड के सरकारी महकमे में उच्च पदस्थ लोला अपने सरल स्वभाव और मेहनती गुणों के कारण सभी के लिए सम्मानीय हैसियत रखती थी। 
वर्षों पहले किसी पब-बार में उसकी नीकोलास से दोस्ती हुई थीऔर फिर दोस्ती प्रेम में बदल गई। उम्र का अंतर उनके प्रेम के बीच कभी बाधा नहीं बना।  हाँलोला एक बच्चा हमेशा से चाहती थीजिसे नाकामयाब नीकोलास हमेशा टालता रहा था।  लेकिन इस बार लोला उम्र के जिस पड़ाव पर खड़ी थीवहाँ से वह कोई और समझौता करने को तैयार न थी और दूसरी तरफ नीकोलास अपने आप को स्थापित करने के हर संभव प्रयास में बच्चे की जिम्मेदारी उठाने को कतई तैयार न था। 

गुस्से में नीकोलास घर से निकल तो गयापर अब जाये तो जाये कहाँकोई भी तो ठिकाना नहीं था उसका। कुछ देर यूँ ही गली में इधर उधर भटकने के बाद और अपनी ही सोच पर पछता करखुद को दो चार गालियाँ दे कर वो पुनः घर लौट आया।  दरवाजा खुला थाजैसा वह छोड़ कर निकला थाबिलकुल वैसे का वैसा ही। उसे हैरानी हुई कि लोली ने बंद क्यों न किया दरवाजाजल्दी से अंदर गया वो। भीतर वाश रूम में लुढ़की हुई थी रक्त से सनी लोलाकमजोर और लगभग बेहोश सी। 

हैरान परेशान उसने तुरंत 112 पर कॉल करके एम्बुलेंस बुलाईलोला को हॉस्पिटल ले जाया गया। सुबह के तनाव और बहस ने लोला की मानसिक स्थिति को गहरे अवसाद में धकेल दिया था।  इसी अवसाद में उसका पुनः एबॉर्शन हो चुका  था। इतने सारे एबॉर्शन के बाद माँ बनने के लिए अब लोला को एक नया जन्म लेना होगा! चाहतों की ज़मीन बेहद भुरभुरी होती है। उसमें धंसते जाओ तो बाहर निकलना असंभव ही हो जाता है। अक्सर चाहतों की लाशें उसी ज़मीन के नीचे दफ़न हुई मिलती हैं। 

इधर निकोलास अपने ख्वाब  पूरा करने के लिए कहीं नई नौकरी तलाश रहा था। उड़ान लम्बी थीपंख छोटे! काश कि नामुमकिन ख्वाबों के पंख ईश्वर ने कुछ और बड़े बनाये होते!
- पूजा अनिल

बुधवार, 11 सितंबर 2019

अनुचित कलंक


प्रत्येक दिन, उन दोषों के साथ,
मैं थोड़ा थोड़ा खुद को निगल जाती हूँ
बिना किसी कारण
तुम जो अनुचित कलंक मुझ पर लगाते हो।
प्रत्येक दिन मैं थोड़ा थोड़ा
काले बुरादे में बदलती जाती हूँ,
जिसमें स्वयं मेरा ही,
सांस लेना कष्टमय हुआ जाता है।
मैं कोशिश करती हूँ
किसी प्रभावी मुखावरण से
मुंह और नाक ढकने की,
जो रिसाव से अभेद्य हो।
किन्तु बुरादा नहीं रुकता,
हमेशा कोई न कोई राह खोज ही लेता है,
खुली हवा तक पहुँचने की।
एक रोज़ तुम्हारे शहर का आकाश,
आच्छादित होगा
एक काले बुरादे से निर्मित बादल से।
लोग सूर्य रश्मियां नहीं देख पाएंगे,
मौसम विज्ञानी चकित हो कहेंगे कि
कदाचित यह किसी बुझी हुई आकाशगंगा का चूर्ण है।
जो लाखों वर्ष पूर्व विद्यमान थी।
कोई उनसे सवाल नहीं करेगा कि
कैसे वह सारा चूर्ण हमारे युग में आ पहुंचा?
लेकिन सिर्फ तुम जानते होंगे कि
यह बादल उन अनुचित कलंकों से बना हुआ है
जो अब हर तरह के दासत्व से मुक्त हो चुके हैं।
-Poojanil
(यह कविता मूलतः स्पेनिश में लिखी थी और मैंने स्वयं इसका अनुवाद किया है।)

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

इच्छाधारी

इच्छाधारी 
कितने तो करुण स्वर में वे, पूछते हैं
हाल मन का 
अथाह प्रेम भरे वे, करते हैं दावा 
सच्ची दोस्ती का 
छोटी से छोटी बात आप की,  
रखते हैं वे याद 
किसी तरह अंतस की गन्दगी, 
छुपा लेते हैं शब्दों से, 
बस भूल जाते हैं, 
कि 
सत्य के पास, 
छिपने के ठिकाने कम होते हैं।  


शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

कैफियत

दिन गुदगुदाने के होते तो
मैं सुनहरी धूप सी दिखती,
संवरने सजने के जो होते दिन तो 
मुझमे सभी नदियों की छाया उमड़ आतीं, 
उदासी के दिनों में हर मौसम बर्खास्त होकर 
मैं सिर्फ और सिर्फ रिम झिम बूंदों सी रोती, 
जब सर्दी से अकड़ते हों तन, डूबते हों मन 
तो मैं गर्मास भरा कहवा का प्याला  होती, 
मगर 
हर मौसम के मध्य तेज आंधी तूफ़ान होकर 
दिलों पर दस्तक देना मेरी मीठी शरारत होती 
-पूजानिल 

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

स्कूल के मध्यावकाश

स्कूल के मध्यावकाश  

मेरे पास एक दोस्त थी।
उसका होना 
मेरे लिए 
अदृश्य अकथ्य सहारा था।
बहुत सारी लड़कियों की तरह 
वो भी वहीँ थी,
जहाँ मैं भी थी स्कूल के मध्यावकाश में,
जिस तरह अन्य लड़कियों को 
मज़ा आता था 
सतौलिया, पकड़म पकड़ाई 
और कंचे खेलने में 
उसे भी पसंद था ठीक यही,
लेकिन मेरी पसंद अलग थी, मेरे खेल भी अलग थे,
मुझे देखना होता था 
गिलहरियों को पूँछ मटकाते भागते हुए, 
तितलियों को एक पुष्प से दूसरे पुष्प तक मंडराते हुए 
और 
छोटे छोटे कंकड़ पत्थरों को उड़ते हुये,
और बस इसीलिए मैं उन सारी लड़कियों से दूर जा,
ग्राउंड के दूसरे छोर पर दौड़ती, 
देखती गिलहरियों को, तितलियों को 
और अंत में  
चुनती कुछ कंकड़, 
हथेली में रख कर उँगलियों से कुछ इस तरह उड़ाती उन्हें कि वे दूर तक उड़ते हुए जाएँ लेकिन लौट न पायें,
मैं इस बात का रखती ख्याल कि इन कंकड़ पत्थरों से किसी को चोट न पहुंचे,
इस लिहाज से मैं कुछ अधिक ही दूर हो जाती बाकी लड़कियों के झुण्ड से,
खेलती, चुपचाप, किसी से कुछ कहे बगैर, 
वो, सतौलिया खेलते- खेलते अचानक रुक जाती, 
उसकी दृष्टि, कुछ खोजते हुए मुझ तक आकर रूकती, 
वो, अपना खेल छोड़ कर पूरा स्कूल ग्राउंड दौड़ कर पार करते हुए मुझ तक चली आती,
मुझे देख मुस्कुराती किसी गाँव की बाला सी निश्छल 
कुछ शरारत और कुछ आग्रह से कहती, '' आओ, देखें, आज किसका कंकड़ दूर तक उछलता है?'' 
मैं मुस्कुराती और चुने हुए कंकड़ दोनों के बीच बाँट लेती। 
वो जीत रही होती थी  
फिर हारने लगती थी,
उसे उस हार में मज़ा आता,
उसे मेरे चेहरे पर जीत का निशान देखने में मज़ा आता,
वो तब तक हारती जब तक सभी चुने हुए कंकड़ समाप्त न हो जाएँ,
फिर मेरा हाथ पकड़ जल्दी से मुझे उड़ा ले जाती, कहती, ''चलो, अब मेरे साथ सतौलिया खेलो!''
अब मेरी बारी आती,
मैं हारती, मुझे मज़ा आता,
वो जीतती, मुझे ख़ुशी होती, 
इस तरह हमारे स्कूल के मध्यावकाश खुशियों की सौगात बन जाते। 
स्कूल से कॉलेज के सफर में हम बिछड़ गए। 
फिर मुलाक़ात होने में बीत गए कई वर्ष। 
एक दिन मुझे बड़ी तेज स्मरण हुआ उसका और 
किसी मित्र से पता पूछ उसका, पहुंची उसके घर। 
लेकिन मैं नहीं जानती थी कि उसका पता अपनी पुस्तिका में मृत्यु देव ने भी  कर लिया था दर्ज! 
भीषण गठिया रोग से वो वो चुकी थी बेजार, 
किसी के सहारे के बिना हिल सकने में भी थी वो तो लाचार,
मेरा दिल वहीँ एक पल में मर गया कई कई बार 
मेरी आँखों में आँसूं भर भर कर बह जाने को थे बेकरार, 
लेकिन मैंने उसे संभाला और उसने मुझे,
कुछ देर के लिए मैं गई थी किन्तु घण्टों बैठी रही उसका हाथ पकड़,
उसने कहा था, ''शायद आज के बाद मैं तुमसे कभी मिल ना पाऊं!'' 
अब हम दोनों के आँसूं बाँध तोड़ बह निकले,
वहीँ एक दूसरे को थामे हुए  
हम दोनों तितलियों की भांति फूल फूल मंडरा आईं,
हम दोनों ही गिलहरी की तरह दौड़ रही थीं,
हम दोनों के पत्थर कंकड़ वहां तक उछल रहे थे जहाँ से कोई लौट कर नहीं आता, 
हम दोनों सतौलिया में जीत गईं  
किन्तु मृत्यु देव के आगे हार गईं। 
हाँ, मैं गर्व से कह सकती  हूँ, मेरे पास भी एक दोस्त थी,
जिसका होना मेरे लिए अदृश्य अकथ्य सहारा था।
-पूजा अनिल 




 




बुधवार, 29 मई 2019

बड़ी बिंदी वाली सखियाँ

कैसी इतरा रही हैं मेरी सखियाँ,
बड़ी सी बिंदी माथे सजाए,
ज़रा देखो तो... 
कैसे कैसे सपने संजोए 
रंग बिरंगी बिंदी के सहारे,
कैसी कैसी विपत्ति को कर आई हैं पार,
पहुंची किस तरह किनारे,
कह रही हैं अपनी जुबानी,
बिंदी वाली कहानियां सुहानी, 
मेरी सखियाँ, 
ज़रा देखो तो... 
कितनी तो कठिनाइयाँ आईं,
कितनी तो राहें इन्होने बनाईं, 
खोज ही लेती हैं हर मुश्किल का हल,
रुक जाने का इनको नहीं कोई विकल्प, 
कितनों के लिए बनीं प्रेरणा,
कितनों का हुईं आसरा,
कितने ही ससुराल सँवारें 
कितने ही मायके तारें,
मेरी सखियाँ, 
ज़रा देखो तो... 
कौन होगा जो इनके 
साहस पर न होगा प्रसन्न!
कौन होगा जो इनके लिए 
न कहेगा आशीर्वचन!
कौन होगा जो इनकी 
चंचल धार में न बह चलेगा! 
कौन होगा जो इनकी 
मधुर लोरी में न विश्राम लेगा! 
हर फ़न माहिर हैं 
मेरी सखियाँ, 
ज़रा देखो तो... 
हर कदम देख भाल 
कर हैं चलतीं,
आसमान छूने का 
संकल्प हैं करतीं,
मन में भरे हैं 
लगन और समर्पण,
आत्मा परमात्मा की  
विवेचना हैं करतीं,
मस्तक पर धारे हुए 
विशाल बिंदी,
हर रोज़ मुझे 
और अधिक अपनी हैं लगतीं 
मेरी सखियाँ, 
ज़रा देखो तो... 
-पूजा अनिल 

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

तिलिस्म

यह अतिशयोक्ति तो नहीं कि 
जिस मुख से तुमने अनगिन वैरायटी की चाय का स्वाद लिया 
उसी मुख से अपने अनगिन प्रेम की कहानियां भी कहीं 
आधी दुनिया जान गई कि तुम 
चाय और प्रेम का नशा करते हो, 
बाक़ी आधी दुनिया ने 
तुम्हारे अलबेले क़िस्से सुन 
किसी जादुई नशे में 
तुम्हें ईश्वर मान, स्वायत्त समर्पण कर दिया।