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रविवार, 9 नवंबर 2025

सपने या सच्चाई?

 किसी डाल पर सपने बैठे, किसी डाल पर सच्चाई, 

आँख खुली तो उड़ गए सपने, बची रह गई सच्चाई! 


साँसों की माला अद्भुत है, जो देती नहीं दिखाई, 

हर क्षण धारण करके फिरती जीव आत्मा साईं। 


दर दर भटकते मांगे भिक्षा, कुछ पैसा दे दो भाई, 

ईमानदारी से करें परिश्रम, पाएँ मेहनत की कमाई। 


चीं चीं चूँ चूँ कर झूठे वादे, जनता गई भरमाई, 

भ्रष्ट नेता और भ्रष्ट अधिकारी सबने इज़्ज़त गँवाई। 


धूप की तेज़ी, हवा की सरसर, तन को छूती माई, 

तेरे आँचल का स्नेह ओढ़ मेरे मन ने छैंया पाई। 


जिसकी जिव्हा पे “हरि नाम” पावन धुन है समाई, 

मीठे उसके वचन जैसे हो माखन मिसरी खाई। 

-पूजा अनिल 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2025

क्या भूलें क्या याद करें

 ये जिंदगी का फ़लसफ़ा बड़ी अजीब शय है बाबू मोशाय! 

जीने की बात पर मरना याद आता है, 

ठहाकों के बीच रोना याद आता है, 

जमीन पर चलते हुए आसमान याद आता है,

खुद को भूलो तो खुदा याद आता है, 

गुनगुनाओ तो दिल का हाल जुबां पर खिसक आता है, 

कॉफी पीते हुए वो अपना सा दोस्त याद आता है , 

किताब पढ़ते हुए लिखने वाले का अक्स दिख जाता है, 

फूलों के साथ बैठो तो सुकून ओ क़रार आ जाता है, 

चिट्ठी लिखने से पहले पाने वाले का न भूलने वाला चेहरा याद आता है,

दिल खोलकर रख दो तो कोई दिलफरेब याद आता है, 

मोहब्बत की बात करो तो केवल ग़म याद आता है, 

हम कब के गुज़र गए होते अगर जिंदगी के ये हसीन ओ अजीब एहसास न होते! 

- पूजा अनिल

मंगलवार, 10 सितंबर 2024

अकेले तुम और हम



क्या तुम्हें पता है कि 

-कितनी दूर तक जा कर लौट आती है मन की आवाज़? 

असीम आसमान और निस्सीम समुन्दर की तरह

अनन्त तक चली जाती है आवाज़, 

रखी रहती है गुदगुदी बनकर, 

मन की आवाज़ वही गुनगुनाहट है 

जो तुम कभी-कभी अनचाहे अपने होंठों पर ले आते हो  

न, नहीं बना अकूत को नापने का कोई यंत्र, मगर तुम जो मेरे सामने हो, मैंने सुन लिया सब कुछ तुम्हारे मन का! 

-कि किसी से बात करने के बाद कितनी बची रह जाती हैं बातें? 

एक गुच्छा भर फूल बिखर जाएँ तो बिखर जाती है ख़ुशबूदार बात, 

तुमसे की गई अथाह बातों के बाद जाने कितनी ख़ुशी बिखरी होगी, तुम्हें भी तो नहीं पता! 

फिर भी मन किया तुमसे कुछ और बात करूँ, 

लगा था कि यह तो कहा ही नहीं, जबकि सोच रखा था कि इस बार यह ज़रूर कहना है, 

 हाँ, बातें तो होंगी अनगिनत, कहे जाने के बाद भी होंगी बातें कई, जो बार बार कही जाएंगी, 

क्योंकि मन की पुलक पर सवाल उठाने का प्रश्न ही नहीं! 

-कि कितनी रातें हमने चुपचाप बिता दीं, अनमने मन को समझा पाए क्या? 

इस अबोले से न तुम राज़ी हो न मैं, फिर भी ढोए जा रहे हैं अनचाहे बोझ की तरह, 

अब समाप्त करो इस खामोश स्याह रात को, तोड़ दो चुप्पी की दीवार, 

सच कहूँ, यदि तुम वहाँ से आओ और मैं यहाँ से, तो दुगुनी गति से मिटेंगी अहंकार की दूरियाँ,  

फिर हम उन अनसुलझी गुत्थियों के ग़ुब्बारे पिन से फोड़ देंगे 

और आवाज़ की गुफ़ा में पुलकित मन के बिस्तर पर सितारों संग जगमगाएँगे! 

- पूजा अनिल 

गुरुवार, 20 जुलाई 2023

प्रेम का स्पर्श

 मैं कितनी देर दरख्त के नीचे खड़ी रही, यहाँ तक कि उसके पत्ते मुझे पहचानने लगे। 

मैंने कितनी बार तुम्हारा नाम लिया, यहाँ तक कि तुम्हारे नाम से पहचानी जाने लगी! 

मैं पत्ता बन कर तुम्हारे आने की प्रतीक्षा नहीं कर सकती इसलिये सम्पूर्ण दरख्त बन कर खड़ी हूँ। 

मैं केवल तुम्हारा नाम नहीं हो सकती इसलिये ज़र्रे ज़र्रे में प्रेम का नरम नाज़ुक स्पर्श बन बस गई हूँ। 

-पूजानिल

बुधवार, 19 जुलाई 2023

उम्र से बढ़कर

 इन्सान

बड़ा होता है, 

बड़ी होती हैं 

उसकी उम्मीदें, 

छोटी हो जाती है 

मासूमियत।

- पूजा अनिल

रविवार, 9 अप्रैल 2023

Small poem

 हाँ, मैंने तो पेट भर लिया अपना ही ग़म खाकर,

भूखे तुम भी रहना मत, खौफ़ खुदा का खा लेना।

-पूजा अनिल