गुरुवार, 8 जनवरी 2026

52 की उम्र में तीसरी मास्टर्स डिग्री

 

K K Sadhwani 

साल 1994 की बात है। एक दिन मेरे पापा (श्री कृष्ण कुमार साधवानी/ के के साधवानी) ने हम सबसे कहा कि उनके पास एम ए की डिग्री है, एम कॉम की डिग्री है और अब एम एस सी की डिग्री प्राप्त करने के लिए उन्हें केवल एक साल की पढ़ाई करनी है। शिक्षा एवं ज्ञान को लेकर उनकी आधुनिक सोच किसी से छिपी नहीं थी। हमें भी वे शिक्षा के प्रति जागरूक करते रहे, उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करते रहे थे। 

 एम एस सी प्रीवीयस एग्ज़ाम वे क्लीयर कर चुके थे। लेकिन कुछ ऐसी दुर्घटनाएँ घटित हुईं कि उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा था और इसी कारण वे एम एस सी फ़ाइनल की तैयारी नहीं कर पाए थे।

 उनकी बात सुनकर सबने कहा रहने दीजिए, अब आप 51 बरस के हैं और अब कहाँ इतना परिश्रम करेंगे! इस बात पर उनका उत्साह जरा भी कम न हुआ बल्कि बड़े उत्साह से उन्होंने बताया कि यदि उन्होंने यह डिग्री भी हासिल कर ली तो यूनिवर्सिटी उन्हें डॉक्टरेट प्रदान करेगी और वे चाहते थे कि उन्हें डॉक्टरेट प्राप्त हो, इसीलिए वे पढ़ाई कर रहे थे।

 फिर उनकी यही बात मुझे भी बेहद उत्साहित करने लगी कि पापा 51 की उम्र में तीसरी मास्टर्स  डिग्री हासिल करने के लिए बेकरार थे। इस उम्र में उनके अधिकांश मित्र पढ़ने पढ़ाने से कोसों दूर हो चुके थे। लेकिन उनका ऐसा बच्चों जैसा उत्साह देखकर मैंने कहा ऐसी बात है तो आपको अवश्य पढ़ाई करनी चाहिए। पापा ने कहा कि मैं करना चाहता हूँ किंतु मुझे तैयारी करने का समय ही नहीं मिल रहा है। ऑफिस में सुबह से शाम निकल जाती है और शाम को घर आने तक मैं इतना थक जाता हूँ कि मोटी मोटी किताबें पढ़ कर नोट्स बनाना मेरे लिए बहुत कठिन है। यदि तुम लोग मेरी मदद कर दोगे तो मैं बड़ी खुशी से यह परीक्षा दे दूँगा।

 हम हैरान हुए कि हम कैसे मदद करेंगे? पापा ने कहा कि मैं तुम्हें किताबें ला कर दूँगा, तुम पढ़ कर मेरे लिए नोट्स बना कर तैयार कर देना और शाम को मुझे पढ़ा देना। लेकिन यह कैसे होगा? 

मैं तब एम एस सी प्रीवीयस ज़ूलोजी में कर रही थी। पापा स्टेटेसटिक्स में पढ़ाई कर रहे थे! दोनों विषयों का कोई मेल नहीं। पापा की कही बात मैं कभी टालती नहीं थी। प्रश्न तो थे लेकिन थोड़ी देर उनसे सवाल जवाब कर के मैंने उनके प्रस्ताव पर सहमति दे दी। 

अगले ही दिन वे अपने कोर्स से संबंधित दो किताबें ले आए और मुझे सौंप दीं कि इनमें से तैयारी करनी है। मैं सुबह अपनी कक्षा में जाकर पढ़ती थी और दोपहर के बाद घर लौट कर पापा की किताबें पढ़ती और नोट्स तैयार करती थी। जितना कठिन मैंने सोचा था, वह उतना कठिन नहीं था। मेरे विषय से भिन्न था, इसलिए पढ़ने समझने में अधिक समय लगता था लेकिन मैं लगातार तैयारी करने लगी थी तो अब वह पढ़ाई भी मेरे जीवन का हिस्सा बन गई थी। 

जो कुछ मैंने पढ़ा होता था वह हर शाम को मैं पापा को पढ़ा देती। पापा भी एक अच्छे विद्यार्थी की भांति पूरे मन से पढ़ते। कोई सवाल होता तो मुझसे पूछते थे। इस तरह मैंने पापा को उनका पूरा कोर्स पढ़ा कर तैयार करवा दिया और अपने स्वयं की परीक्षा भी तैयार कर ली। 

साल 1995 में पापा ने परीक्षा दी,जहां तक मुझे याद है संभवतः सितम्बर 1995 में रिज़ल्ट आया था और वे  बहुत अच्छे मार्क्स से पास हो गए थे। हम सब बहुत खुश थे कि अब पापा के पास तीन तीन मास्टर डिग्री हो जाएंगी। और पापा को डॉक्टरेट भी मिल जाएगी। 

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। 8 जनवरी 1996 यानी आज से 30 साल पहले पापा को ह्रदयाघात हुआ और वे डॉक्टरेट लिए बिना ही 53 साल की छोटी सी आयु में इस दुनिया से चले गए। 

शिक्षा के प्रति उनका लगाव और समर्पण, न केवल परिवार में बल्कि हमारे पूरे समाज में हमेशा एक प्रेरक उदाहरण रहा। आज वे हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके आदर्श और उनकी प्रेरणा सदा हमारी मार्गदर्शक बनी हुई है। ऐसे प्रेरक व्यक्तित्व दुनिया में कम ही होते हैं, मेरे पापा उनमें से एक हैं जो अपनी आधुनिक विचारधारा से समाज के उत्थान के लिए समर्पित रहे। मुझे गर्व है कि मैं उनकी संतान बन कर इस दुनिया में आई। 

आज उनकी तीसवीं पुण्यतिथि पर उन्हें नमन करते हुए हम उनके प्रति हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। आप सदैव हमारे दिल में निवास करते हैं पापा।
-पूजा अनिल 


6 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेरणात्मक व्यक्तित्व को विनम्र नमन 🙏
    वे नहीं हैं पर अपनी बिटिया में अपनी छवि छोड़ गए हैं। आप सभी पर उनका आशीष बना रहे।

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  2. बहुत प्रेरक व्यक्तित्व...पिताजी की झलक आपमें है...अब भी आप शिक्षण से जुड़ी है..उनका आर्शीवाद बना रहे

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  3. बहुत प्रेरक व्यक्तित्व...पिताजी की झलक आपमें है...अब भी आप शिक्षण से जुड़ी है..उनका आर्शीवाद बना रहे

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