दर्द दुनिया से अनचाहे मिलते रहे,
हम तोहफे समझ अपनाते रहे.
हमदर्द कुछ बांटने को आये दर्द, (तो)
मुस्कुराहटों में आँसू छिपाते रहे.
मुश्किलों ने बार बार दस्तक दी,
उन्ही से दरो दीवार सजाते रहे.
जो आँसूओं पर भी लग गए पहरे,
शब्द समेटने में रातें बिताते रहे.
तन्हाइयों से फासले और कम हुए,
सन्नाटों को कहानियाँ सुनाते रहे.
जिन राहों पर कभी कांटे नहीं मिलते,
नयन उन्ही के ख्वाब दिखाते रहे .
क्यों ये ख्वाब सच नहीं हुआ करते,
ख़याल ताउम्र ये सवाल उठाते रहे.
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शब्द समेटना - कहानी अथवा कविता लेखन
गुरुवार, 5 नवंबर 2009
मंगलवार, 20 अक्टूबर 2009
एक रक्षा कवच
तुम्हारी मीठी बातें,
मुझे ही नहीं,
मोह लेती हैं बाकी सब को भी,
इन बाकी ´सब´ में शामिल हैं,
तुम्हारे दादा-दादी, नाना - नानी,
और मोहल्ले के सभी
चाचा- चाची, भुआ, भैया और दीदी.
तुम्हे देख कर चहक उठता है मन,
दौड़ जाती हैं खुशियों की लहरें,
फिर अचानक आती है एक लहर भय की,
कहीं नज़र ना लग जाये तुम्हे.......!!!!
इसीलिए...
सोचती हूँ कि तुम्हारी सलामती के लिए,
हो आऊं पंडित जी के पास,
और एक रक्षा कवच बनवा लूं.
फिर उठते हैं कई सवाल....
और यह सब अंधविश्वास लगने लगता है,
क्या दुनिया में बुराई इतनी प्रबल है कि,
सोचने भर से किसी का बुरा होगा???
मन कहता है कि,
सच्चाई और अच्छाई की हमेशा जीत हुई है..........
हर बुरी नजर का तोड़,
तुम्हारा भोलापन /मासूमियत है
कौन हानि पहुंचा पायेगा इस ईश्वरीय मुस्कान को....!!!
मुझे ही नहीं,
मोह लेती हैं बाकी सब को भी,
इन बाकी ´सब´ में शामिल हैं,
तुम्हारे दादा-दादी, नाना - नानी,
और मोहल्ले के सभी
चाचा- चाची, भुआ, भैया और दीदी.
तुम्हे देख कर चहक उठता है मन,
दौड़ जाती हैं खुशियों की लहरें,
फिर अचानक आती है एक लहर भय की,
कहीं नज़र ना लग जाये तुम्हे.......!!!!
इसीलिए...
सोचती हूँ कि तुम्हारी सलामती के लिए,
हो आऊं पंडित जी के पास,
और एक रक्षा कवच बनवा लूं.
फिर उठते हैं कई सवाल....
और यह सब अंधविश्वास लगने लगता है,
क्या दुनिया में बुराई इतनी प्रबल है कि,
सोचने भर से किसी का बुरा होगा???
मन कहता है कि,
सच्चाई और अच्छाई की हमेशा जीत हुई है..........
हर बुरी नजर का तोड़,
तुम्हारा भोलापन /मासूमियत है
कौन हानि पहुंचा पायेगा इस ईश्वरीय मुस्कान को....!!!
शुक्रवार, 28 अगस्त 2009
मेरी माँ
मेरी माँ
मैं घिरी सघन वृक्ष लताओं से,
तुम तेजस्विनी /
अरुण्मय प्यार तुम्हारा,
स्वर्णिम,
सूर्य रश्मियों सा
छनकर,
दस्तक मेरे दिल पर देता।
तुम्हे देख रही मैं बचपन से,
कहाँ जान पाई पूरे मन से!!!
तुम आत्मसात कर लेती सबको,
अपने विशाल ह्रदय में.
करती सबके बोल अंतर्मन,
यही तुम्हारा बाल मन,
सबका मन हर लेता।
मैं घिरी सघन वृक्ष लताओं से,
तुम तेजस्विनी /
अरुण्मय प्यार तुम्हारा,
स्वर्णिम,
सूर्य रश्मियों सा
छनकर,
दस्तक मेरे दिल पर देता।
तुम्हे देख रही मैं बचपन से,
कहाँ जान पाई पूरे मन से!!!
तुम आत्मसात कर लेती सबको,
अपने विशाल ह्रदय में.
करती सबके बोल अंतर्मन,
यही तुम्हारा बाल मन,
सबका मन हर लेता।
सोमवार, 17 अगस्त 2009
कुछ खुशियाँ चुराई हैं मैंने
जब तक मुझे विश्वास था
कि तुम्हारी दो आँखें मुझे देख रही हैं ,
मैं कहता रहा तुमसे
अपना ध्यान रखा करो
और खुश रहा करो ,
बहुत स्वार्थी था मैं,
कभी शुक्रिया ना कह पाया.
तुम्हे यह जताता रहा
कि मुझे फ़िक्र है तुम्हारी
और तुम मेरा ध्यान रखती रही .
आज जब तुम चली गयी
कभी ना लौटने के लिए
तो सत्तर साल में पहली बार
तन्हा होने का एहसास हुआ
कि आदत हो चली थी मुझको
उन दो आंखों की,
जो प्रतीक्षा किया करती थी ,
मेरे घर लौट आने तक.
और मैं करता रहा वादा
तुम्हे ज़िन्दगी भर खुशियाँ देने का
और बटोरता रहा
खुशियाँ
जो तुम मुझे देती रही,
आज फ़िर ,
तुम्हारी यादों के खजाने में से
कुछ खुशियाँ चुराई हैं मैंने ,
और निकल पड़ा हूँ
मुस्कान बांटने ,
अपने जैसों के बीच .
कि तुम्हारी दो आँखें मुझे देख रही हैं ,
मैं कहता रहा तुमसे
अपना ध्यान रखा करो
और खुश रहा करो ,
बहुत स्वार्थी था मैं,
कभी शुक्रिया ना कह पाया.
तुम्हे यह जताता रहा
कि मुझे फ़िक्र है तुम्हारी
और तुम मेरा ध्यान रखती रही .
आज जब तुम चली गयी
कभी ना लौटने के लिए
तो सत्तर साल में पहली बार
तन्हा होने का एहसास हुआ
कि आदत हो चली थी मुझको
उन दो आंखों की,
जो प्रतीक्षा किया करती थी ,
मेरे घर लौट आने तक.
और मैं करता रहा वादा
तुम्हे ज़िन्दगी भर खुशियाँ देने का
और बटोरता रहा
खुशियाँ
जो तुम मुझे देती रही,
आज फ़िर ,
तुम्हारी यादों के खजाने में से
कुछ खुशियाँ चुराई हैं मैंने ,
और निकल पड़ा हूँ
मुस्कान बांटने ,
अपने जैसों के बीच .
मंगलवार, 11 अगस्त 2009
जश्न ए आज़ादी
जब भी स्वतंत्रता दिवस मनाने का समय आता है, हमारा मन खराब हो जाता है. आप सब जानना चाहेंगे कि ऐसा क्यों? क्या हम हमेशा गुलाम रहना चाहते हैं? नहीं जनाब, ऐसी कोई बात नहीं है. हमें भी अपनी आज़ादी से बड़ा प्रेम है.
अब बात यह है कि बचपन से ही स्वतंत्रता दिवस को बड़े ही नपे तुले ढंग से मनाये जाते देखा. झंडारोहण , शहीदों को श्रद्धांजलि, परेड और लड्डू बांटना. और उस पर यह कि छुट्टी का दिन है, सभी अपनी स्वतंत्रता को अपने ढंग से मनाना चाहते हैं, इसलिए बड़ी जल्दी में इस सारे आयोजन को समाप्त किया जाता है, किसी ने अपने परिवार के साथ पिकनिक का कार्यक्रम रखा है और किसी ने दोस्तों के साथ, अब तय किया हुआ है तो जाना तो होगा ही... आज़ादी मिले तो छः दशक से भी ज्यादा हो गये हैं, अब क्या फर्क पढता है कि, हम उसके जश्न में शामिल हों या ना हों.... अब ना तो हम गुलाम हैं और ना ही शहीदों वाले जज्बात हैं !!!!!!!!!!!! क्या फर्क पढता है कि हम अपनी आज़ादी के जश्न को परेड करके मनाएँ या पिकनिक करके.....महत्तवपूर्ण यह है कि हम आजाद तो हैं ना....!!!!!!!!! फिर कैसी पाबन्दी????
दिल चीर चीर हो जाता है जब आज़ादी के मतवालों के नाम कोई देशभक्ति गीत बजता है, जब कोई उन बीते हुए दिनों को याद करते हैं . हमारा जन्म स्वतंत्र भारत में हुआ था, पर हमने गुलामी के बारे में, गुलाम भारत पर हुए जुल्मों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा और सुना तो है ना.... खून में उबाल लाने के लिए उतना ही काफी है, इतनी बर्बरता, इतनी अमानवीयता क्यों किसी को झेलनी पढ़े? जब ईश्वर ने सभी इंसान सामान बनाए हैं तो किसी भी इंसान को दूसरे पर जुल्म करने का अधिकार नहीं मिलता.
किन्तु समस्या यही है कि इंसान अपने विचारों से गुलाम है, जब तक विचार स्वाधीन नहीं होते, तब तक किसी भी तरह की स्वाधीनता की बात करना बेमानी है. और यही हमें मथता रहता है. इसलिए प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर हम संकल्प करते हैं कि हम अपने विचारों को गुलाम नहीं होने देंगे. हमारे विचार पराधीन नहीं होंगे . गुलाम भारत के स्वाधीनता संग्राम में तो भाग नहीं लिया, पर स्वाधीन भारत के इस स्वतंत्रता अभियान को हम जरूर अमली जामा पहनाएंगे.
वास्तव में हमारे लिये स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने से अधिक महत्त्वपूर्ण अपनी स्वाधीनता को कायम रखना है और प्रत्येक स्वाधीनता दिवस हमें उसकी याद दिलाता है कि आज़ादी के दीवाने किस कदर अपनी जान पर खेल कर भी देश को आजाद करवाना कहते थे. बस वही जूनून,वही जोश..... हमें होश देता है और हम अपने वचन को और प्रतिबद्धता से निभाने का संकल्प कर लेते हैं.
जय हिंद
अब बात यह है कि बचपन से ही स्वतंत्रता दिवस को बड़े ही नपे तुले ढंग से मनाये जाते देखा. झंडारोहण , शहीदों को श्रद्धांजलि, परेड और लड्डू बांटना. और उस पर यह कि छुट्टी का दिन है, सभी अपनी स्वतंत्रता को अपने ढंग से मनाना चाहते हैं, इसलिए बड़ी जल्दी में इस सारे आयोजन को समाप्त किया जाता है, किसी ने अपने परिवार के साथ पिकनिक का कार्यक्रम रखा है और किसी ने दोस्तों के साथ, अब तय किया हुआ है तो जाना तो होगा ही... आज़ादी मिले तो छः दशक से भी ज्यादा हो गये हैं, अब क्या फर्क पढता है कि, हम उसके जश्न में शामिल हों या ना हों.... अब ना तो हम गुलाम हैं और ना ही शहीदों वाले जज्बात हैं !!!!!!!!!!!! क्या फर्क पढता है कि हम अपनी आज़ादी के जश्न को परेड करके मनाएँ या पिकनिक करके.....महत्तवपूर्ण यह है कि हम आजाद तो हैं ना....!!!!!!!!! फिर कैसी पाबन्दी????
दिल चीर चीर हो जाता है जब आज़ादी के मतवालों के नाम कोई देशभक्ति गीत बजता है, जब कोई उन बीते हुए दिनों को याद करते हैं . हमारा जन्म स्वतंत्र भारत में हुआ था, पर हमने गुलामी के बारे में, गुलाम भारत पर हुए जुल्मों के बारे में बहुत कुछ पढ़ा और सुना तो है ना.... खून में उबाल लाने के लिए उतना ही काफी है, इतनी बर्बरता, इतनी अमानवीयता क्यों किसी को झेलनी पढ़े? जब ईश्वर ने सभी इंसान सामान बनाए हैं तो किसी भी इंसान को दूसरे पर जुल्म करने का अधिकार नहीं मिलता.
किन्तु समस्या यही है कि इंसान अपने विचारों से गुलाम है, जब तक विचार स्वाधीन नहीं होते, तब तक किसी भी तरह की स्वाधीनता की बात करना बेमानी है. और यही हमें मथता रहता है. इसलिए प्रत्येक स्वतंत्रता दिवस पर हम संकल्प करते हैं कि हम अपने विचारों को गुलाम नहीं होने देंगे. हमारे विचार पराधीन नहीं होंगे . गुलाम भारत के स्वाधीनता संग्राम में तो भाग नहीं लिया, पर स्वाधीन भारत के इस स्वतंत्रता अभियान को हम जरूर अमली जामा पहनाएंगे.
वास्तव में हमारे लिये स्वतंत्रता दिवस का जश्न मनाने से अधिक महत्त्वपूर्ण अपनी स्वाधीनता को कायम रखना है और प्रत्येक स्वाधीनता दिवस हमें उसकी याद दिलाता है कि आज़ादी के दीवाने किस कदर अपनी जान पर खेल कर भी देश को आजाद करवाना कहते थे. बस वही जूनून,वही जोश..... हमें होश देता है और हम अपने वचन को और प्रतिबद्धता से निभाने का संकल्प कर लेते हैं.
जय हिंद
सोमवार, 3 अगस्त 2009
भाई
रक्षा बंधन के पावन पर्व पर मेरे भाई और भाई -बहिन के पवित्र रिश्ते को समर्पित एक कविता.
पिता के सपनों का संसार,
आधा आधा बांटा प्यार,
नन्हा शिशु, माँ आँचल में,
पेड़ आम का, आँगन में,
रेशमी धागा,नेह की रीत,
प्रेम की डोरी, सच्चा मीत,
बहना होती उसकी प्यारी,
ली रक्षा की जिम्मेदारी,
रोली, कुमकुम और चन्दन,
बहिन ने बाँध दिया बंधन.
कोमल रिश्ता, दर्पण सा,
बना आधार नव जीवन का.
पूजा
पिता के सपनों का संसार,
आधा आधा बांटा प्यार,
नन्हा शिशु, माँ आँचल में,
पेड़ आम का, आँगन में,
रेशमी धागा,नेह की रीत,
प्रेम की डोरी, सच्चा मीत,
बहना होती उसकी प्यारी,
ली रक्षा की जिम्मेदारी,
रोली, कुमकुम और चन्दन,
बहिन ने बाँध दिया बंधन.
कोमल रिश्ता, दर्पण सा,
बना आधार नव जीवन का.
पूजा
बुधवार, 29 जुलाई 2009
मृत्यु
घनघोर अंधेरे में
खो सी गयी थी कहीं ,
बैचेन आँखे
थक कर
सो ही गयीं थी यहीं .
राह सूझती ना थी कोई ,
सफर का साथी नहीं कोई .
अकेले कहाँ तक ले जाती
ये हमदर्द राहें !!!
तभी नज़र आई
इक
किरण उजाले की ,
उसे थाम लेने की देर थी बस....
पर,
इंतज़ार ,
किसी और को
था मेरा ,
मेरे गुजर जाने की देर थी बस ....
छंट गया सारा
अँधेरा !!!
खो सी गयी थी कहीं ,
बैचेन आँखे
थक कर
सो ही गयीं थी यहीं .
राह सूझती ना थी कोई ,
सफर का साथी नहीं कोई .
अकेले कहाँ तक ले जाती
ये हमदर्द राहें !!!
तभी नज़र आई
इक
किरण उजाले की ,
उसे थाम लेने की देर थी बस....
पर,
इंतज़ार ,
किसी और को
था मेरा ,
मेरे गुजर जाने की देर थी बस ....
छंट गया सारा
अँधेरा !!!
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