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रविवार, 4 मार्च 2018

पोस्टकार्ड मटमैला

[25/03/2016] डायरी से-
 यादें हमारे मन मस्तिष्क के किस कोने में घर बसाती हैं, यह तो हम कभी नहीं जान सकते, किंतु जब यही यादें अचानक सामने आकर चौंका देती हैं तो यह ज़रूर जान लेते हैं कि कोई याद हमारे ही भीतर छिपी सांस ले रही थी, पल रही थी अपने प्रत्यक्ष होने की प्रतीक्षा में।
आज होली पर अचानक ऐसी ही एक याद सामने आई, जब मैंने अपने परिवार और मित्रों को वर्चुअल होली की बधाई भेजी।
मैंने अपना पहला ख़त तब लिखा होगा जब मुझे अक्षर ज्ञान हुआ। अ आ ई इ लिख कर अपने ननिहाल भेजा होगा। जिसे पढ़कर जाने कितनी प्रशंसा भी पाई होंगे उस ख़त को पढ़ने वालों से। उसके बाद ख़त लिखने का सिलसिला जब तक ब्याह न हुआ, चलता ही रहा। शादी के बाद भी कुछ समय यह सिलसिला जारी रहा। फिर जल्द ही ई मेल्स ने इसकी जगह ले ली। फिर और भी गति बढ़ी। चैट फिर व्हाट्सऐप। अब ख़त नहीं लिखती मैं। किसी को भी नहीं। सब कुछ सन्देश इंस्टेंट मेसेज के जरिये भेजे जाते हैं।
खैर, यह याद नहीं थी। मुख्य याद है 15 पैसे वाला पीला सा  मटमैला रेतीले रंग वाला  पोस्टकार्ड। आपमें से बहुतों को याद होगा वह पोस्टकार्ड। जब बहुत छोटी थी तब से ही याद है कि पिताजी अपने परिवार और मित्रों को प्रत्येक त्यौहार पर उसी पोस्टकार्ड पर सन्देश स्वयं अपने हाथ से लिखकर भेजते थे। उनकी हस्तलिपि बेहद सुंदर रही। मैं भाषा कुछ कुछ समझने लगी तो उनका साथ देने लगी पोस्टकार्ड लिखने में। फिर एक समय ऐसा भी आया जब उनके सारे पोस्टकार्ड्स लिखने का जिम्मा मेरा रहा। त्यौहार से लगभग दस दिन पहले लिख कर सन्देश भेज दिया जाता था। मैटर इतना सिम्पल था कि मुझे बचपन से ही याद हो गया था। We wish you and your family a very happy.... so n so त्यौहार।  पापा हिंदी में भी शुभकामनाएं भेजते थे। हिंदी में मेटर भी इसी तरह बेहद छोटा सा होता था। आपको और आपके पूरे परिवार को फलाँ फलाँ त्यौहार की बधाई।
नीचे पापा के नाम के साथ उनके हस्ताक्षर। और सबसे ऊपर दायें कोने में तारीख और शहर का नाम। पोस्टकार्ड के दूसरी तरफ दो कॉलम होते थे। प्रेषित प्रेषक .. यानी एक तरफ भेजने वाले का पता लिखते हम और दूसरी तरफ पाने वाले का पता। करीब 30-35 पोस्टकार्ड्स तैयार करके इसी तरह भेजे जाते थे। उनमें से कई लोग जवाब भी देते थे, तो मुझे बड़ी ख़ुशी होती थी कि पढ़कर किसी ने पोस्टकार्ड के जरिये जवाब तो दिया।
आज भी यदि किसी ने मेरे पापा के उन, त्यौहार पर बधाइयों वाले, पोस्टकार्ड्स संभाल कर रखे हों तो निश्चित ही मेरी हस्तलिपि उनके पास अमानत के तौर पर रखी हुई होगी।
इस साल 2016 में होली पर मेरी बधाई सबको पहुँच गई होगी, पर मेरी हस्तलिपि नहीं पहुंची। पापा के साथ होली खेले हुए भी तो बीस साल हो गए!
-पूजानिल

बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

प्रेरणादायक

अनुभव -
कुछ दिन पहले मैं डॉक्टर के केबिन के बाहर अपने बुलाये जाने की प्रतीक्षा कर रही थी। मुझसे पहले ही एक बुजुर्ग महिला भी प्रतीक्षा कर रही थी। यूँ ही सामान्य सी बातें चल निकलीं उस से। वह उस डॉक्टर की तारीफ कर रही थी कि यह बहुत ही अच्छी डॉक्टर है। वह पहले कई बार आ चुकी थी, मैं पहली बार गई थी उसके पास।
बातों बातों में उसने बताया कि वह 80 साल की है। सुनकर मुझे हैरानी हुई, क्योंकि वह अधिकतम पैंसठ- छासठ साल की स्वस्थ, सक्षम और सजग महिला लग रही थी। मैंने कहा आप अस्सी साल के नहीं लगते हो, किस तरह इतना सुडौल और खूबसूरत बनाये रखा है खुद को? उसने कहा मैं खूब ध्यान रखती हूँ अपना। खूब पानी पीती हूँ और रोज़ ताजा बना खाना खाती हूँ। पैदल करने जाती हूँ और घर के काम भी करती हूँ। आगे उसने कहा आजकल लोग बहुत जल्दी अपनी त्वचा ख़राब कर बैठते हैं और उनके पास समय भी नहीं अपना ध्यान रखने का। मैं उनकी बात से सहमत थी।
प्रेरणादायक बात यह कि एक अस्सी वर्ष की महिला, खुश और तारो ताजा दिखती बुजुर्ग स्त्री स्वयं ही निपट अकेली हॉस्पिटल आई थी, वो भी लोकल बस में। किसी तरह की कोई शिकायत नहीं कि पति साथ नहीं आया और ना ही बच्चों से कोई उम्मीद कि वे उसके साथ आएंगे।
उस से बात करके मुझे महसूस हुआ जवान बने रहने का एक राज़ यह भी है कि स्वयं को सक्षम बनाया जाए और जहां तक संभव हो किसी और के भरोसे न रहा जाए। किसी का मोहताज होना अर्थात स्वयं को कमजोर करना। जबकि स्वयं पहल करके अपने काम करना अर्थात स्वयं को मजबूत बनाना, अपने आप को शक्ति प्रदान करना। फिर चाहे कोई भी उम्र हो आप सदैव स्वावलम्बी रहेंगे, खुश प्रसन्न रहेंगे।

सोमवार, 23 मई 2016

कुछ स्मृतियां कुछ स्मृतियों पर


- स्मृतियां मुस्कान होती हैं, आँखों में खिली रहती हैं। 
- स्मृतियां आंसूं होती हैं, होठों से चुपचाप बहती हैं। 
-स्मृतियां दृष्टि होती हैं, अनाम राह  में उजाला बनती हैं। 
- स्मृतियों को अँधेरे में देखना।  जुगनू सी दिखेंगी।  उस रौशनी में साफ़ साफ़ देख लोगे रिश्ते की अदृश्य डोर।
- स्मृतियों की लाशों का बोझ अपने कन्धों पर मत ढोना, स्मृतियां किसी और की होंगी, कंधे तुम्हारे दुखेंगे। 
- स्मृति में अक्सर वही विचरते हैं जो आपके जीवन से विदा ले चुके होते हैं। 
- स्मृतियाँ दरवेश या फ़क़ीर नहीं होतीं कि आये, खाये, झूमे गाए और अलविदा। बल्कि स्मृतियां देवी देवता होती हैं।  आप पर प्रसन्न हो गए तो सदा कृपा दृष्टि, कुपित हो गए तो वक्र दृष्टि से नवाजती हैं। 
- स्मृतियां बेहतरीन नर्तक होती हैं।  जेहन में इस तरह नाचती हैं कि  विश्राम का समय दिए बिना अपने साथ अविराम नृत्य करने को बाध्य कर देती हैं। 
- स्मृतियां रेलगाड़ी होती हैं।  अनन्त बोगियों वाली रेल।  इसकी प्रत्येक सीट पर कोई भूली बिसरी सवारी बैठती है।  कोई सवारी तुम्हे आवाज़ दे तो मुंह न फेर लेना बल्कि हाथ पकड़ उसे तसल्ली से उतार लेना दिल के स्टेशन पर। 
- स्मृतियां चादर होती हैं।  ओढ़ कर सो जाओ तो इस गर्मास से बाहर निकलने का मन ही न करे!
- स्मृतियां प्रेम नहीं होतीं, नफरत भी नहीं होतीं। बस सक्षम होती हैं कि प्रेम का नन्हा पौधा रोप दें या नफरत का बीज बो दें। 
- स्मृतियां पैरों का पैरहन नहीं होतीं, माथे की शोभा होती हैं।  इन्हे ताज की तरह धारण करना, चमक उठोगे तुम इसकी परछाई में। 
-पूजा अनिल