रुके हुए सारे ख़याल ,
मौन की मुखरता को
चित्त की चंचलता को ,
और मन् की एकाग्रता को ,
पानी का सा प्रवाह देते रहे ,
कशमकश
ध्वनि और स्वर की चलती रही ,
ना दुःख जीता
ना सुख हारा
अन्तर्द्वन्द समेटे रहा निशा को,
हर नयी भोर, नयी संध्या,
नयी चुनौती देते रहे.