गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

लोपामुद्रा - अजन्मी ब्रह्मवादिनी

 


लोपामुद्रा - अजन्मी ब्रह्मवादिनी 

वैदिक युग में नारी के भली भांति शिक्षित होने के साथ ही समाज में उनके समान अधिकार और पूर्ण  सम्मान के बारे में लगभग सभी वेद कहते हैं। यहाँ तक कि वेदों के निर्माण में भी महिलाओं का पुरुषों की तरह ही एक समान योगदान होने के बारे में उल्लेख मिलता है। हालाँकि, इसके साथ ही समाज में स्त्री की एक सीमित भूमिका का भी संदर्भ मिलता है। हाँ, सभ्यताओं के दो विपरीत किनारों पर खड़ी स्त्री समाज के लिए सदैव उपयोगी रही है, इसमें कोई संदेह नहीं। उपनिषदों, शास्त्रों तथा पुराणों में नारी को एक सूक्ष्म एवं  तेजस्वी शक्ति के रूप में उपासना किये जाने का संदर्भ मिलता है। इन शास्त्रों में से कुछ प्रमुख नाम हैं: देवी उपनिषद, देवी महात्म्य एवं देवी भागवत पुराण।  इसके अलावा ऋग्वेद का देवी सूक्त कहता है कि ब्रह्मांड के सृजन के मूल में स्त्री शक्ति है तथा शाश्वत, अविनाशी स्वरुप में यह शक्ति सर्वत्र व्याप्त है, स्वयं ब्रह्म, आत्म एवं अनुभूति में भी इसी स्त्री तत्त्व की उपस्थिति कही गई है।  

 

  वैदिक स्त्रियों में कुछ अत्यंत प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण नाम हैं - घोषा, मैत्रेयी, गार्गी। ये सभी तपस्विनी, ब्रह्मवादिनी, दर्शन शास्त्री, संत, कल्याणकारी तथा अत्यंत विदुषी स्त्रियों में गिनी जाती हैं। इन्होने अपनी प्रखर बुद्धि से वेद, पुराण एवं उपनिषद रचना में भी सहयोग दिया। इन्हीं नामों में एक नाम है लोपामुद्रा का। 

 

पू॒र्वीर॒हं श॒रद॑: शश्रमा॒णा दो॒षा वस्तो॑रु॒षसो॑ ज॒रय॑न्तीः। 

मि॒नाति॒ श्रियं॑ जरि॒मा त॒नूना॒मप्यू॒ नु पत्नी॒र्वृष॑णो जगम्युः ॥ १ ॥ ऋग्वेद 1.179.1 

 भावार्थ:

 जैसे बाल्यावस्था को लेकर विदुषी स्त्रियों ने प्रतिदिन प्रभात समय से घर के कार्य और पति की सेवा आदि कर्म किये हैं, वैसे किया है ब्रह्मचर्य जिन्होंने, उन स्त्री-पुरुषों को समस्त कार्यों का अनुष्ठान करना चाहिये॥ (स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद, संदर्भ वेद डॉट कॉम - https://xn--j2b3a4c.com/rigveda/1/179/1) 

 

 लोपामुद्रा ने ऋग्वेद में उपरोक्त सूक्त एवं गृहस्थ जीवन के बारे में कुछ अन्य सूत्र लिखे हैं। इन सूत्रों में रति कर्म एवं गृहस्थ पुरुष के अपनी पत्नी के प्रति कर्तव्य के बारे में उल्लेख आता है। लोपामुद्रा की कहानी जानने एवं उसके द्वारा लिखित ऋग्वेद के सूत्रों का मर्म जानने के बारे में  मुझे जिज्ञासा हुई तो कुछ छानबीन करने के पश्चात् जो कहानी हासिल हुई, वह कहानी और कुछ प्रश्न , कुछ अवलोकन लेकर मैंने यह आलेख लिखने का प्रयास किया है। 

लोपामुद्रा को  प्राचीन भारतीय वैदिक साहित्य में तत्वज्ञानी के रूप में वर्णित किया गया है।  इन्हें अन्य नामों से भी जाना जाता है, कावेरी, कौशितकी एवं वरप्रदा। एक महत्वपूर्ण बात जो उनके बारे में कही जाती है कि वे एक प्रसिद्ध ब्रह्मवादिनी के रूप में पहचानी जाती हैं। आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूंगी कि ब्रह्मवादिनी उपाधि उस स्त्री को दी जाती है जो इस विश्व के रहस्य, तत्वज्ञान एवं ब्रह्म सत्य की तलाश में सम्पूर्ण प्रयास तथा परिश्रम करके ज्ञान प्राप्त करती है तथा उस प्राप्त ज्ञान के कारण वेद व्याख्याता भी कही जाती है। 

 

शास्त्रों में जिन तीन महत्वपूर्ण ग्रंथों में लोपामुद्रा का आख्यान आता है, वे हैं: ऋग्वेद, महाभारत का वनपर्व तथा गिरिधर रामायण। 

  

कहा जाता है कि ऋषि अगस्त्य (सप्तऋषियों में से एक) अपने पुरखों की शांति हेतु श्रेष्ठ संतान पाने की इच्छा से अपने लिए एक सर्वगुण संपन्न पत्नी चाहते थे। अतः उन्होंने संसार के विभिन्न प्राणियों के सर्वश्रेष्ठ अंग अथवा गुण लेकर एक बालिका का सृजन किया। इस सृजन से प्राणियों के विशेष गुणों अथवा अंगों का ह्रास होने के कारण ऋषि द्वारा सृजित कन्या का नामकरण लोपामुद्रा हुआ। बाद में ऋषि अगस्त्य ने उसे विदर्भ देश के राजा को सौंप दिया, जो कि संतान प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या कर रहे थे। राजा ने उस नन्ही शिशु को अपनी पुत्री मानकर उसका पालन पोषण किया।  जब वह विदर्भ राजकुमारी विवाह योग्य हो गई तब ऋषि अगस्त्य राजा के पास उस कन्या से विवाह की कामना से पहुंचे और लोपामुद्रा द्वारा विवाह की स्वीकृति मिलने से वह उनकी पत्नी बन गई। 

विवाहोपरांत लोपामुद्रा ने राजमहल तथा राजसी वस्त्राभूषणों का त्याग कर दिया और ऋषितुल्य वस्त्रों में अपने पति के आश्रम में रहने चली गई।  किन्तु जल्दी ही वह अपने पति के संयमित व्यवहार एवं तपस्या से उकता गई और इस उकताहट को उन्होंने ऋग्वेद में स्वयं के प्रति ध्यान दिए जाने तथा पत्नी को प्रेम दिए जाने के बारे में लिखा। यह छंद देख कर ऋषि को अपने पति धर्म निभाने का ज्ञान हुआ और तब उन्होंने अपनी पत्नी पर ध्यान देकर गृहस्थ धर्म निभाया। यह साडी कथा महाभारत के अरण्य पर्व में वर्णित है। 

 

ऋग्वेद में लोपामुद्रा ने श्रेष्ठ संतान पाने हेतु दम्पति के आदर्श परस्पर व्यवहार को निर्देशित करते हुए सूक्त लिखे हैं। इन्हें दंपत्ति को समर्पित सूक्तों की श्रेणी में रखा गया है। जैसे: 

 अ॒गस्त्य॒: खन॑मानः ख॒नित्रै॑: प्र॒जामप॑त्यं॒ बल॑मि॒च्छमा॑नः। उ॒भौ वर्णा॒वृषि॑रु॒ग्रः पु॑पोष स॒त्या दे॒वेष्वा॒शिषो॑ जगाम ॥

(ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:179» मन्त्र:6 | अष्टक:2» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:6) 

भावार्थ-

 

 जैसे कृषि करनेवाले अच्छे खेतों में उत्तम बीजों को बोय कर फलवान् होते हैं और जैसे धार्मिक विद्वान् जन सत्य कामों को प्राप्त होते हैं वैसे ब्रह्मचर्य से युवावस्था को प्राप्त होकर अपनी इच्छा से विवाह करें वे अच्छे खेत में उत्तम बीज सम्बन्धी के समान फलवान् होते हैं ॥ ६ ॥ (स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद) 

 

लोपामुद्रा के बारे में पढ़ते हुए यह ज्ञात होता है कि - 

1 - पूर्व में ऋषियों के पास संभवतः कोई ऐसी विधि थी अथवा कोई ऐसा ज्ञान था जिस से बिना गर्भ धारण के संतानोत्पत्ति संभव थी।  जैसे इस आख्यान में ऋषि अगस्त्य इस संसार से विभिन्न अवयव एकत्र करके एक सुंदरतम विदुषी कन्या की कल्पना करते हुए एक पिंड बना कर उसे कन्या रूप में परिवर्तित कर देते हैं। यदि इस कहानी को केवल एक कपोल कल्पना भी माना जाए तो लोपामुद्रा के जन्म लेने का अन्यत्र कहीं सन्दर्भ मिलना चाहिए, जो कि अब तक कहीं नहीं मिलता।  

 

2  - जब ऋषि उस से विवाह का प्रस्ताव लेकर आते हैं तब विदर्भराज अपनी पुत्री का विवाह एक ऋषि से नहीं करवाना चाहते और वे अपनी पत्नी के सामने इस विषय पर वार्तालाप करते हैं। साथ ही राजा को ऋषि द्वारा शापित होने का भी भय है। इस दुविधा के समय में अपने पिता को आश्वस्त करते हुए लोपामुद्रा ऋषि से अपने विवाह का निर्णय स्वयं ही लेती है। राजा द्वारा अपनी पुत्री का यह निर्णय स्वीकार्य होता है, जिसका अर्थ यह हुआ कि उस काल में स्त्री का स्वेच्छा से विवाह करना अत्यंत सहज सामाजिक प्रक्रिया के अंतर्गत होना चाहिए। जहाँ स्त्री के चुनाव को सहमति दिए जाने में हिचकिचाहट नहीं होती होगी। यदि ऐसा न होता तो लोपामुद्रा के निर्णय का विरोध किया जाता तथा उसे पिता द्वारा चुने हुए वर से विवाह के लिए बलपूर्वक राजी किया जाता। इसी अंश में राजा अपनी पत्नी से विमर्श करते हैं, जो कि इस बात का सूचक है कि उस काल में पत्नी का उचित मान हुआ करता था और अपनी पत्नी से विचार विमर्श करने में स्वयं राजा भी आगे बढ़कर अपनी दुविधा के बारे में बात करते थे। 

 

3 - विवाह के पश्चात आश्रम में जब ऋषि तपस्या में लीन थे और लोपामुद्रा ने स्वयं को अकेला पाकर पति के साथ की चाह में कुछ सूक्त रचे तो ऋषि ने न केवल उन सूत्रों को वेद वचन की भांति सम्मान दिया अपितु उन सूत्रों को वेदों में सम्मिलित भी किया। यही नहीं, पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए ऋषि कर्म से मुक्त होकर पति धर्म निभाते हुए एक गृहस्थ के समान पत्नी समागम भी किया। और जिस श्रेष्ठ पुत्र की चाह में उन्होंने यह विवाह किया था, इस से उन्हें वह पुत्र भी प्राप्त हुआ। आख्यान के इस अंश से मैं यह समझती हूँ कि उस काल में एक स्त्री पति संसर्ग के लिए स्वयं प्रस्ताव रखने तथा पति को आकर्षित करने में झिझकती नहीं थी। सवाल यह है कि क्या उस समय में देह भोग एक छिपा कर रखने का विषय रहा होगा? यह भी संभव है कि लोपामुद्रा एक राजा के पास राजसी शिक्षा से पाली गई, अतः उसमें एक भयमुक्त स्वाभाविक त्वरा रही हो, उसी कारण उसमें अपनी बात कहने का पूर्ण आत्मविश्वास हो! दूसरे, ऋषि द्वारा अत्यंत बुद्धिमती स्त्री के रूप में उसका सृजन किया गया, जिसकी वजह से अपने सृजन के प्रति एवं उसकी आत्मविश्वास और ज्ञान से भरपूर बात के प्रति ऋषि आनंदित अनुभव करते हों एवं सहज ही उसे संतुष्ट करने को तत्पर हुए हों! 

 

इन परिस्थितियों का उस काल में जो भी कारण रहा हो, यह तो निश्चित ही सत्य है कि लोपामुद्रा अत्यंत रूपमती और ज्ञानवती स्त्री थी। इस आख्यान का अंत करने से पहले मैं लोपामुद्रा के नदी बन जाने की कहानी भी बताना चाहूंगी। कहा जाता है कि किसी कारण रुष्ट होकर  विष्णु भगवान ने लोपामुद्रा को श्राप दिया कि नदी बन जाओ। किन्तु ऋषि को लोपामुद्रा से दूर होना कष्टकर प्रतीत हुआ। अतः उन्होंने अपने कमंडल में नदी रूपी लोपामुद्रा को सहेज लिया। एक वेगवान नदी की लिए एक छोटे से कमंडल में बंद होकर रहना कठिन था।  यह कठिनाई दूर करने के लिए श्री गणेश एक कौवे के रूप में आये और तपस्या करते ऋषि के पास ही रखे कमंडल को गिरा दिया। इस प्रकार लोपामुद्रा कमंडल में से नदी की तरह बह निकली और कावेरी नदी के नाम से पहचानी गई। 

 

एक अजन्मी अद्भुत कन्या को किसी साधारण रूप से जन्मे व्यक्ति की भांति मृत्यु नहीं प्राप्त हो सकती थी, अतः उसका नदी बन कर जग कल्याणकारी रूप में परिवर्तित हो जाना ही श्रेयस्कर! 

पूजा अनिल 

 Note- यह आलेख साहित्यनामा पत्रिका के फरवरी 2024 अंक में प्रकाशित हुआ। 

गुरुवार, 11 सितंबर 2025

व्यंग्य- कसूरवार होते हैं विचार



मई 2023 में आ. रामस्वरूप दीक्षित जी ने एक व्यंग्य भेजने के लिए कहा था। फिर इस पर कभी बात नहीं हुई। अचानक कल उनका संदेश आया इन दो पृष्ठों के चित्रों के साथ। दोस्तों, सदीनामा पत्रिका में मेरा एक व्यंग्य प्रकाशित हुआ है। आप सभी के लिए इसे यहाँ साझा कर रही हूँ। 

श्री रामस्वरूप  दीक्षित जी का आभार व्यक्त करती हूँ। 


शनिवार, 6 सितंबर 2025

वह क्रिस्तीना है?


मैं शाम को वॉक करके घर लौट रही थी। रास्ते में कुछ बच्चे मिले, अपने पेरेंटस के साथ जाते हुए। उनके चेहरे रंगे हुए थे और आँखों पर मास्क लगा हुआ था। वे बेहद खुश थे, माँ को कोई घटना बताते हुए। उनकी माँ भी बतियाती जा रही थी। बस यह दृश्य देखकर मेरे चेहरे पर भी मुस्कान छा गई। मुझे मुस्कुराते देख माँ लोग भी मेरी तरफ मुस्कुरा दिए। बच्चे मुझे यूँ भी बहुत अच्छे लगते हैं। फिर स्पेनिश बच्चे तो एकदम गोरे गोरे रूई के समान गुलाबी गुलगुले लगते हैं। 


रोड क्रॉस करने लगी तो दूसरी तरफ़ तीन चार लोग अपने नन्हे मुन्नों के साथ खड़े थे। सब बच्चों के चेहरे डिज़ाइनर रंग बिरंगे रंगे हुए, हाथों में लॉलीपॉप और ढेर सारी खुशी की चमक! शायद वहीं पास के सेलिब्रेशन सेंटर में किसी ने अपने बच्चे का जन्मदिन मनाया होगा। और उस समय बच्चे सेंटर से बाहर निकल रहे थे। 


जैसे ही ज़ेब्रा क्रॉसिंग पार किया उनमें से एक सफेद फ्रॉक पहने हुए बच्ची ने मुझे देख कर तुरंत दौड़ लगाई और ज़ोर से चिल्लाई “क्रिसतीनाऽऽऽऽ!!!” और तत्क्षण आकर मुझसे लिपट गई। अत्यंत खुशी से झूमने लगी। 

मैं तो वैसे ही इतने प्यारे बच्चों को देखकर बड़ी प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए जा रही थी। उसके इस अपनत्व भरे आलिंगन से जैसे हज़ारों वॉट की चमक आ गई मुझमें। 

मैंने उस बच्ची को प्यार से होला! कहा, पूछा कि वह कैसी है और मैं उसी मिठास से हँसते हुए आगे निकलने लगी। लेकिन वह बच्ची बेहद उत्साहित होकर अपने पैरेंट्स से दोहरा कर कहने लगी कि देखो क्रिस्तीना है! वे सब लोग मुझे देख रहे थे। मैंने हँस कर हाथ हिला कर उन्हें भी अभिवादन कर आगे बढ़ गई। 


मेरे पीछे वे तीनों बच्चे मुझे बार बार आवाज़ देकर बुलाते रहे- क्रिस्तीनाऽऽऽऽऽऽ!! “क्रिस्तीनाऽऽऽऽऽऽऽ!” इतनी प्यारी आवाज़ें सुनकर सड़क के दूसरे छोर से मुझे उन्हें मुड़ कर देखे बिना आगे बढ़ा ही नहीं गया। मैं ठिठकी, दूर से ही हाथ हिलाकर उन्हें बाय किया। उन्होंने भी मुझे हाथ हिलाकर बाय किया और फिर मैं अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी। उनके पैरेंट्स अभी भी मुझे जाते हुए देख रहे थे। 


शायद उनकी किसी अतिप्रिय अध्यापिका का नाम क्रिस्तीना होगा, जो कि बच्चों की मनपसंद टीचर होगी! अनजाने ही उसके हिस्से का प्यार मुझे मिल गया। बच्चे ऐसी ऊर्जा का स्रोत होते हैं कि जो निष्प्राण में भी तत्काल प्राण फूंक देते हैं, बस उसी ऊर्जा के आलिंगन के बाद से मन अधिक खिला खिला सा है। शिक्षक दिवस पर इस तरह उपहार स्वरूप बच्चों का साथ मिलना सबसे बड़ा उपहार हो गया।  

-पूजा अनिल 


सोमवार, 4 अगस्त 2025

तुलसी पौधे का बचाव

  यह देखकर अच्छा लगता है कि दोस्त आपके जीवन की समस्याओं में शामिल हो कर न केवल अपनी चिंता प्रकट करते हैं बल्कि अच्छी सलाह भी देते हैं। 

बीते दिनों तुलसी के पौधे के संक्रमित होने के बारे में  फ़ेसबुक पर लिखा तो जो भी साथी उसके बारे में कमेंट करने आए, वे पौधे को काटने की बजाय उसे बचाने की सलाह दे रहे थे। उन साथियों की यह चिंता गौर करने लायक़ है। इसलिए पौधे को काटने से पहले मैंने नेट पर उसके बारे में जानकारी हासिल की। 

मेरे तुलसी पौधे पर स्केल्स का संक्रमण हुआ था और जितने घरेलू नॉन टॉक्सिक प्रयोग किए जा रहे थे वे बिल्कुल काम नहीं आ रहे थे। मुझे हैरानी थी कि ऐसा क्यों हो रहा था!! तो इसका उत्तर नेट सर्च में मिला। 

तुलसी पर लगभग आठ प्रकार के संक्रमण होते हैं। जिनमें से एक है स्केल्स का संक्रमण। ये २-३ मिमी के परजीवी हैं। तुलसी पौधे की हरी टहनियों  एवं पतियों पर चिपक जाते हैं और उसका रस चूसते हैं। इस तरह पौधे की पत्तियाँ सूख कर पीली पड़ जाती हैं और पौधे का बढ़ना रूक जाता है। साथ ही ये परजीवी एक तरह का चिपचिपा द्रव्य उत्पन्न करते हैं जो कि चींटियों को आकर्षित करता है। चींटियों को आकर्षित करने का सबसे बड़ा कारण है कि ये स्केल्स के लिए वाहन का काम करती हैं। इससे स्केल्स अन्य पौधों तक पहुँच सकते हैं। इस चिपचिपे द्रव्य के कारण मिट्टी में फंगस भी उत्पन्न हो जाती है। और ये सब मिलकर पौधे का समूल नाश कर सकते हैं। 

एक बहुत बड़ा प्रश्न मेरे सामने यह था कि मेरे घर में ये स्केल्स आए कहाँ से? यहाँ चींटियों का नामोनिशान तक नहीं है। तो नेट पर मिली जानकारी के अनुसार ये हवा में उड़ते हुए डस्ट द्वारा भी पौधे तक पहुँच जाएँ तो पौधे को संक्रमित कर सकते हैं। मेरे केस में भी यही हुआ प्रतीत होता है। इन दिनों गर्मी के मौसम में खिड़की खुली रहती है और सूखी धूल भरी हवाएं चलती रहती हैं। अत: यह कारण काफ़ी हद तक सही लग रहा है।  

अब यह जानना ज़रूरी है कि स्केल्स पर किसी घरेलू दवा का असर क्यों नहीं होता है। दरअसल जैसा कि इन परजीवियों का नाम ही स्केल्स है यानी शल्क, तो यह नाम इनकी संरचना की वजह से दिया गया है। बाहर से इनके ऊपर एक ऐसा कार्टिलेज कवच बना हुआ है जो कि कीटनाशक से इनकी रक्षा करता है और ये आसानी से खत्म नहीं किए जा सकते हैं। क्योंकि बाहर से नहीं ख़त्म किए जा सकते इसलिए हमारे सभी उपाय असफल हो गए। लेकिन केमिकल कीटनाशक के प्रयोग से इन्हें नष्ट किया जा सकता है। तुलसी एवं इसके परिवार के अन्य पौधों की पत्तियों को खाने के लिए काम में लाया जाता है, इसलिए रासायनिक कीटनाशक का उपयोग नहीं किया जाता है। 

और एक अन्य उपाय यह कर सकते हैं कि जैसे ही परजीवी की उपस्थिति का ज्ञान हो, वैसे ही शुरुआत में ही रूई को अल्कोहल में डुबोकर किसी लकड़ी की डंडी पर बांध कर उस से टहनी पर चिपके स्केल्स को हटाने की कोशिश की जाए। मेरे पौधे पर यह संक्रमण अत्यधिक फैल गया था इसलिए यह उपाय काम का नहीं था। ऐसी परिस्थिति में पौधे की संक्रमित टहनियों को काट देना उचित था। इसलिए जब मैंने पूरा पौधा परजीवी के हवाले कर देने की बात कही तो मित्रों को यह बात पसंद नहीं आई। 

मैं भी चाहती थी कि पौधे को कुछ नुक़सान ना हो। लेकिन इतना संक्रमित पौधा देखकर उसके बचाव की संभावना नगण्य थी। मगर अब मैंने एक चांस लिया है और पौधे की जड़ के पास वाले तने को छोड़कर बाकी पूरा पौधा काट कर स्केल्स के हवाले कर दिया। इस हिस्से पर स्केल्स नहीं दिख रहे तो मैंने सोचा कि देखते हैं…, क्या पौधे को नया जीवन मिल सकता है!! तने के इस  हिस्से पर रूई को अल्कोहल से भिगोकर घुमा दिया। गमले पर भी रूई को फिराया। मिट्टी को हिलाकर ऑक्सीजनेटेड किया। घरेलू दवा का छिड़काव कर दिया। अब जो होगा, देखा जाएगा! 

एक संभावना है कि मिट्टी में भी स्केल्स की उपस्थिति हो सकती है। यदि ऐसा होता है  और पौधे पर पुनः संक्रमण होता है तो पूरे गमले सहित पौधे को विदा करना पड़ेगा।  

काश! नई उगने वाली साफ़ सुथरी कोमल तुलसी की टहनियाँ संक्रमण से मुक्त रहें! 

-पूजा अनिल 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2025

मेरा तुलसी पौधा

1 August 2025 

Pooja diary 

मेरा तुलसी पौधा 

मैंने तीन दिन पहले यानि 29 जुलाई को फ़ेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी जिसमें लिखा था कि मेरे तुलसी पौधे पर कीड़े लग गए हैं और बचाव के उपाय सुझाएँ। बहुत सारे लोगों ने अपने अनुभव के आधार पर कई सुझाव दिए। सभी बहुत अच्छे उपाय थे लेकिन एक उपाय ने मेरे मर्म को गहरे तक छुआ। यह था पौधे की संक्रमित टहनी काट कर उस पर पलते हुए स्केलस कीट को भी पोषण लेने दिया जाए। 

मैंने अगले दिन यही करने का निर्णय किया। विचार सघन था कि जैसे पौधे को जीने का अधिकार है वैसे ही कीट को भी है। क्या पौधे को बचाने के लिए मैं कीट का जीवन छीन सकती हूँ? अगला विचार यह था कि यदि ऐसा सोच कर कृषि की जाए तो कृषक शायद ही कुछ उपज पा सकें! तो क्या मैं एक पौधे पर कीट को पलने नहीं दे सकती? क्या मुझे किसी को मारने का अधिकार है, चाहे वह कोई कीट ही क्यों न हो? तेज द्वंद्व था मगर कीट को जीवन देने वाला विचार प्रबल था। अंततः अत्यंत भारी ह्रदय से मैंने संपूर्ण तुलसी पौधे को कीट के हवाले कर दिया। यह जानते हुए भी कि मेरे लिए इस भरे-पूरे तुलसी पौधे को खोना किसी अपने को खोने के समान है और यह दुख मेरे साथ जीवन भर रहेगा। (एक बार मैंने तुलसी पौधा लगाया था, जो बहुत अच्छा बढ़ रहा था। तब मेरे भारत दौरे के दौरान वो मुरझा गया और मैं आज तक उसे याद करती हूँ।)


एक अति प्रिय पौधे को कीट के हवाले करने का साहस करना कितना घातक है यह मैं ही जानती हूँ जबकि यहाँ पर दो बातें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। 

पहली बात- स्पेन में तुलसी पौधा उगाने के लिए बहुत जतन करने पड़ते हैं। कारण यहाँ की लम्बी सर्दियाँ हैं। मैं कई बार यहाँ की जलवायु में अपने तुलसी पौधे लगा कर गँवा चुकी हूँ। इस बार बहुत परिश्रम से एक सुन्दर झाड़ी तैयार कर दी थी। उम्मीद थी कि अब यह लम्बा जीवन जीने लायक़ तैयार हो गई है। हरी भरी लहराती हुई तुलसी की झाड़ी बेहद आकर्षित बन गई थी।  तेज धूप में गर्मियों के लंबे दिनों का फ़ायदा उठाते हुए तुलसी दिन पर दिन घनी हुई जा रही थी। 

अचानक एक कीट (स्केलस) कहीं से इस पर आ गया। धीरे-धीरे उसने तुलसी पर पलना और परिवार बढ़ाना शुरू किया। 

तब तक मैं घरेलू उपाय के तौर पर साबुन एवं मिर्ची के घोल से इसे भगाने का प्रयास कर चुकी थी। लेकिन यह प्रयोग असफल रहा। तब फ़ेसबुक पर पोस्ट लिख कर उपाय पूछे। उपाय आरम्भ कर दिया था। लेकिन यह तुलसी इतनी पोषक थी कि कीट को किसी तरह के उपाय से कुछ विशेष असर नहीं हुआ बल्कि उसकी बढ़ने की गति भी तीव्र हो गई। 

दूसरी बात- इस बीच जिस उपाय के मर्म को छूने की बात कही, वह लगातार विचारों को मथ रहा था। पौधों में भी जीवन है और कीट में भी। किसे बचाऊँ? पौधा मेरे लिए उपयोगी है, कीट विनाशकारी है। फिर भी कीट के प्रकोप से मैं अपने पौधे को बचा नहीं पाऊँगी, यह एहसास होने लगा था। कहीं गहरे पैठ गया है एक विषाद! यह दुःख और पीड़ा पौधे के साथ जुड़े ममत्व के कारण है। मैं पौधों से बातें करती हूँ, सर्दी में धूप में रखकर उसे कठोर सर्दियाँ बिताने की हिम्मत देती हूँ, ज़रूरत होती है तो रैकी करती हूँ, बिल्कुल बच्चों की तरह देखभाल करती हूँ, तो जुड़ाव तो गहरा होना ही है।   

पौधे के मुरझाते ही कीट किसी अन्य पौधे की तरफ चल देंगे, लेकिन मेरी तुलसी?? 

पहली बार ऐसा लगा कि मैं इसके बाद कभी तुलसी पौधा नहीं उगा पाऊँगी। 

-पूजा अनिल

शनिवार, 14 जून 2025

माँ को प्रणाम

 


यह जीवन बेहद unpredictable होता है। कभी इतना लंबा कि समाप्त ही नहीं होता और कभी इतना छोटा कि समय से पहले ही खत्म हो जाता है। माँ बाद वाली कैटेगरी में हैं। समय से पहले ही इस दुनिया से चली गईं। मैं चाहती हूँ कि वे लौटकर आएँ और एक लंबा जीवन जीते हुए फिर से मुझ पर अपने प्यार की बरसात करें। मगर  दुख की बात है कि ऐसा होता नहीं है। इस दुनिया से जाने के बाद कोई लौटता नहीं है। हम नियति से बँधे हुए हैं और  यही स्वीकार करने को बाध्य हैं। लेकिन ईश्वर को बताना चाहती हूँ कि माँ जैसा प्रेम करतीं थीं, ऐसा अनमोल प्रेम कहीं और नहीं मिल सकता।  इसलिए दुनिया भर की अच्छी अच्छी माँओं को लंबा जीवन दिया करे। 


दिल से जुड़ी हुई, बस यादें रह जाती हैं जो एहसास दिलाती हैं कि माँ चाहे किसी भी दुनिया में हों लेकिन वे आज भी अपना आशीर्वाद दे रही हैं। यह जीवन उनकी देन है, हमारे लिए एक अनमोल उपहार है। लव यू एंड मिस यू मम्मा। ❤️❤️


मीठी चुपड़ी गुड़ की रोटी जैसी माँ,  

हरित धनिए वाले परांठे जैसी माँ, 

स्वाद की पोटली, प्यार की बारिश,

और साहसी नदी सी मेरी प्यारी माँ। 


माँ की पाँचवी पुण्यतिथि पर कोटि कोटि नमन है उन्हें।  🙏🙏🌹🌹

गुरुवार, 5 जून 2025

विश्व पर्यावरण दिवस 2025


 जब मैं स्पेन आई थी, तब शुरुआत के दिनों की बात है। मैंने देखा कि सड़क पर किसी ने अपने घर का फर्नीचर निकाल कर रख दिया था। फर्नीचर एकदम नया सा था, सुंदर था, अच्छी लकड़ी का बना हुआ था और कहीं खरोंच तक नहीं आई थी। 

मुझे हैरानी हुई कि इतना सुंदर फर्नीचर क्यों सड़क पर पड़ा था!!!  अपने भारत 🇮🇳 देश में तो बनियान को भी पूरी तरह उपयोग करके फिर फेंका जाता था! तो यह तो अच्छा ख़ासा सजावटी फर्नीचर था! और मेरे लिए एकदम नई बात थी यह!!! 

मैंने अपने पति से पूछा कि यह क्या माजरा है? 

तो उन्होंने बताया कि स्पेन में ऐसा चलन है कि जब भी लोगों का मन करता है  कि वे अपने घर को नए रूप में सजाना चाहते हैं तब वे घर की पुरानी चीजें निकाल कर घर के बाहर रख देते हैं और अपने घरों में नई चीजें ले आते हैं। यह चलन इतना आम था कि किसी के लिए कोई अनोखी बात नहीं थी। अक्सर सड़कों पर फर्नीचर दिख ही जाता था। 

उस फर्नीचर को उठाने के लिए एक सरकारी ट्रक किसी नियत दिन पर आती थी और फिर उस फर्नीचर को नष्ट कर दिया जाता था।  

मैं अब तक “था” का प्रयोग करके लिख रही हूँ, क्योंकि अब यह चलन बहुत कम हो गया है। लोग अब भी अपने फर्नीचर निकाल कर बाहर रखते हैं लेकिन अधिकतर टूटा फूटा या बेकार पड़ा फर्नीचर। 

यह परिवर्तन क्यों हुआ? क्या ये लोग पर्यावरण के प्रति जागरूक हो गए हैं कि लकड़ी के जरिए पेड़ों को काटने से बचा रहे हैं?  

मुख्यतः प्रवासी जनसंख्या बढ़ने से उस स्पेनिश मानसिकता पर रोकथाम लग गई। दूसरे, 2008 के फ़ाइनेंशियल क्राइसिस ने भी लोगों में सजगता बढ़ाई कि संसाधनों का अनावश्यक इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। 

मज़े की बात यह है कि स्पेन में लकड़ी उत्पादन अब भी बहुत ज़्यादा होता है। लेकिन अधिकतर वृक्ष संरक्षित क्षेत्र में जितने पेड़ काटे जाते हैं, उतने ही नए पेड़ पुन: लगाए जाते हैं। इस से पेड़ों की कटाई के बावजूद पेड़ों की कमी नहीं होती। 

अब क्या परिवर्तन हुआ है? 

बाज़ारवादी संस्कृति को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है, चीज़ें ख़रीदने के लिए कई तरह की योजनाएं बनाई जाती हैं, जिनमें प्रमुख हैं पब्लिसिटी। इस से लोग बिना ज़रूरत के भी कुछ न कुछ सामान ख़रीदते हैं और अंततः जिसकी वजह से पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ता है। सभी ऐसा करते हैं की भेड़चाल में सारी दुनिया लगी हुई है, लेकिन इस भेड़ चाल पर तब तक रोक नहीं लगाई जा सकती है जब तक कि “यह वस्तु मुझे भी चाहिए“ की प्रवृत्ति नहीं बदल जाती! निश्चित ही हर एक वस्तु की आवश्यकता हमें नहीं होती है, कई बार केवल देखा-देखी में चीजें ख़रीद ली जाती हैं और कभी प्रयोग तक नहीं की जाती हैं। 

यह प्रवृत्ति बाज़ारवाद की देन है और उसी मानसिकता पर रोक लगाने की ज़रूरत है। 

विश्व पर्यावरण दिवस पर इस बार केवल इतना सा आग्रह करना है कि आप संसाधनों का दुरुपयोग न करें। किसी की नक़ल में अपने घर को दुनिया भर की चीज़ों से न भर दें ताकि बाद में वे ही चीज़ें सड़कों पर न पड़ी रहें! आवश्यकता और इच्छा के बीच अंतर को समझें और अपने पर्यावरण की रक्षा में सहयोग करें। 

इसके लिए प्रकृति भी आपको धन्यवाद कहेगी! 

-पूजा अनिल