शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2025

आलेख- स्पेन में हिंदी की यात्रा




 स्पेन में हिन्दी की यात्रा 

मैं यह मानती हूँ कि भाषाएँ नदी की धारा की तरह होती हैं, जहाँ राह मिल गई, उसी तरफ आबाद हो जाती हैं। हमारी प्रिय भाषा हिन्दी भी इस नियम का अपवाद नहीं है। भारत भूमि से निकल कर भारतीय मूल के प्रवासी यात्री विश्व में जिस किसी देश में जा बसे, हिन्दी भाषा वहाँ विकसित हो गई और अब दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहाँ हिन्दी भाषी न मिलें! इसी तरह यूरोप के दक्षिण पश्चिम में बसे एक छोटे से उपमहाद्वीपीय देश स्पेन में भी अनेक प्रवासी भारतवंशियों तथा कुछ विदेशी मूल के लोगों द्वारा हिन्दी भाषा प्रचुरता से लिखी पढ़ी, सुनी और बोली जाती है। 

जनसंख्या का भाषा से संबंध 

स्पेन की भौगोलिक स्थिति से यहाँ की जलवायु लगभग मध्य भारत के पठारी मैदानी मौसम के अनुरूप कही जा सकती है, जहाँ सर्दियों में अत्यधिक शीत एवं गर्मियों में अत्यधिक उच्च तापमान अनुभव किए जाते हैं। अतः भारत देश में उत्तर मध्य राज्यों के निवासी भारतीयों हेतु स्पेनउपयुक्त जलवायु वाला देश है। संभवतः इसी कारण से स्पेन में भारतीय महाद्वीप के लोगों की प्रचुरता है। इसमें पाकिस्तान बांग्लादेश, नेपाल,भूटान, तिब्बत और श्रीलंका के निवासियों को भी गिना जा सकता है। भारत से स्पेन आनेवाले मुख्यतः पंजाब, गुजरात, राजस्थान,महाराष्ट्र,मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडू और केरल के निवासीहोते हैं। इन राज्यों में से राजस्थान और मध्य प्रदेश में हिन्दी प्रमुख भाषा के रूप में प्रयोग की जाती है, जबकि उपरोक्त बाकी सभी राज्यों में अपनी अपनी प्रमुख भाषा एवं बोली है और उस प्रदेश के लोग उसी बोली में बात करने में सहज रहते हैं। किन्तु यह भेद स्पेन आने के बाद धीरे धीरे मिटने लगता है और चाहे जिस किसी प्रदेश से आए हुये लोग हों, वे भारतीय मूल के अन्य लोगों से सहजता से हिन्दी में बात करना आरंभ कर देते हैं।  

भौगोलिक दृष्टि से स्पेन के तटीय क्षेत्र बेहद विकसित एवं सघन जनसंख्या क्षेत्र हैं, इसका मुख्य कारण पर्यटन, वाणिज्य तथा व्यापार हेतु जलीय पोर्ट की उपलब्धता है, जिससे यहाँ के निवासियों को व्यापार करने और धनोपार्जन में यथोचित सहायता मिलती है। इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुये भारतीय मूल के प्रवासी भी ऐसे प्रमुख वाणिज्यिक क्षेत्रों में बसने को तत्पर रहते हैं और भारतवंशियों की घनी आबादी स्पेन केतटीय क्षेत्र में अधिकाधिक देखने को मिलती है। यदि इस अनुपात में देखा जाये तो जितनी अधिक भारतीय जनसंख्या, उसी अनुपात में हिन्दी का वर्चस्व उस क्षेत्र में देखने सुनने को मिलता है। जैसे बार्सेलोना में आपको राह चलते हुये हिन्दी वार्तालाप सुनने को मिल जाये तो कोई आश्चर्य न होगाक्योंकि वहाँ स्पेन में बसने वाली सर्वाधिक भारतीय जनगणना है, करीब 20.875  व्यक्ति। राजनीतिक भूखंडों के अनुसार स्पेन में 17 स्वायत्तशासी राज्य तथा 2 स्वायत्तशासी शहर हैं। इन सभी राज्यों तथा शहरों में साल 2022 तक कुल 53056* भारतीय व्यक्तियों की आबादी की गणना की गई। 

*ref - https://epa.com.es/padron/hindues-en-espana/

जब विदेश में एक बड़ी संख्या प्रवासियों की मिलती हो तो निश्चित ही उनकी भाषा का स्वरूप उस भूभाग में प्रबल होने लगता है। बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में स्पेन में आकर बसे कुछ गिने चुन भारतीय परिवारोंसे बढ़ते बढ़ते आज एक बड़ी मात्रा में भारतीय जनसंख्या स्पेन में हिन्दी भाषा के विस्तृत स्वरूप से परिचय करवाती है। चाहे वे अहिन्दीभाषी क्षेत्र से ही क्यों न सम्बन्ध रखते हों, स्पेन आकर अधिकांश लोग हिंदी बोलने के आदि हो जाते हैं,इससे हिन्दी सीखने के आधार को भी समुचित बल मिलातथा इन हिंदी सीखने वालों में विदेशी नागरिक भी सम्मिलित हो जाते हैं। 

स्पेनिश लोग हिन्दी क्यों सीखते हैं?

इस सवाल का उत्तर जानना बेहद आवश्यक है क्योंकि भविष्य में यही उत्तर भारत और स्पेन के संबंधों को मजबूत बनाने का आधार बनेगा. अधिकांश स्पेनिश मूल के व्यक्ति व्यापार एवं वाणिज्य में उत्तरोत्तर बढ़ती गतिविधियों के कारण हिन्दी सीखने को प्रेरित हुये हैं। कालांतर में भारत एवं स्पेन के मध्य अनेक द्विपक्षीय व्यापार विनिमय संधियों के तहत दोनों देशों के सांस्कृतिक - वाणिज्यिक संबंध अत्यंत मधुर एवं पुष्ट बने हैं,जिससे दोनों देशों के बीच कई तरह के विपणन मार्ग खुले, जिनमें से भारत से स्पेन को निर्यात होने वाले कुछ प्रमुख मद हैं, ‘अध्यात्म, योग, संगीत –नृत्य कला, फिल्म, मसाले, अन्न, सूत- कपास, कपड़ा बाज़ार एवं इस्पात।’ इन सब वाणिज्यिक मदों के साथ साथ हिन्दी और संस्कृत भाषा भी स्पेनिश व्यापारियों को आकर्षित करने लगी, जिससे वे भारतीय बाज़ार में आसानी से व्यापार विनिमय करने हेतु अपने पैर जमा सके। 

इसके अलावा हिन्दी / बॉलीवुड फिल्मों का आकर्षण भी एक अन्य प्रमुख आकर्षण रहा है कि स्पेनिश लोग हिन्दी सीखना चाहते हैं। हिन्दी गाने,हिन्दी फिल्मों के संवाद और कुछ भारतीय फिल्मी कलाकार स्पेनिश लोगों को बेहद प्रिय हैं, अनेकों बार इसी के चलते वे हिन्दी सीखने को तत्पर हो जाते हैं। 

एक अन्य बेहद लोकप्रिय कारण है हमारे धार्मिक ग्रंथ, रामायण तथा श्रीमद भगवद गीता। स्पेन में इन ग्रन्थों की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन ग्रन्थों का स्पेनिश अनुवाद कई कई बार किया गया है और साथ ही समय समय पर रामायण के मंचन की व्यवस्था भी की जाती रही है। दूसरी तरफ आप कई स्पेनिश लोगों को आप गीता के सिद्धांतों के बारे में बात करते हुये सुनते हैं। वे लोग न केवल गीता पढ़ते हैं बल्कि जीवन में गीता के दर्शन को समझने और अपनाने का प्रयत्न भी पूर्ण ह्रदय से करते हैं,कर्म का सिद्धान्त उनमें से सर्वाधिक उद्धृत किया जाने वाला सिद्धान्त है। 

कुछ अन्य कारणों में से एक अन्य प्रमुख कारण है भारतीय साहित्य का स्पेनिश अनुवाद उपलब्ध होना। हिन्दू ग्रन्थों के अलावा भारतीय साहित्य में से प्रेमचंद एवं गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर रचित साहित्य का सबसे अधिक स्पेनिश अनुवाद किया गया है। जिसे स्पेनिश लोग पढ़ते और समझने की निरंतर कोशिश करते हैं। 

स्पेन में हिन्दी अध्ययन कहाँ?

मुझे हिन्दी शिक्षण में सबसे अधिक प्रभावी कदम के तौर पर, स्पेन में रहने वाली महिलाओं द्वारा अपने बच्चों को हिन्दी भाषा ज्ञान देना, लगता है। स्पेन में भारतीय मूल की कई महिलाएं हैं जो घरेलु स्तर पर न केवल अपने बच्चों को बल्कि अन्य बच्चों को भी हिन्दी पठन पाठन द्वारा अपनी भाषा तथा संस्कृति से परिचित करवा रही हैं। सप्ताह में छुट्टी के एक दिन समय निकाल कर बच्चे हिंदी पढ़ते हैं और हिंदी भाषा सीख कर गर्वित अनुभव करते हैं,और उनके इस सार्थक प्रयास के प्रति मैं उन माताओं का हार्दिक अभिनंदन करना चाहूंगी कि वे हमारी नई पीढ़ी के भीतर अपने मूल से जुडने का गौरव और सांस्कृतिक मूल्यों का बीज बो रही हैं। 

मार्च 2003 में स्थापित कासा दे ला इंडिया** समूह भारत एवं भारतीय भाषा संस्कृति को प्रचारित करने हेतु कार्य करने वाली स्पेन की जानी मानी संस्थाएं हैं। 

कासा दे ला इंडिया स्पेन में स्थित भारत और स्पेन के संबंध मजबूत करने के लिए गठित संस्था है। इसमें न केवल राजनीतिक तथा वाणिज्यिक बल्कि सांस्कृतिक संबंध पुख्ता बनाने हेतु भी विभिन्न आयामों के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिनमें जन-सहभागिता भी रहती है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं का स्पेनिश अनुवाद इस संस्था का एक प्रमुख प्रोजेक्ट रहा है। इसके अलावा भारत देश की संस्कृति को समर्पितकार्यक्रम आयोजित करने में यह संस्थान अग्रणी भूमिका निभा रहा है। हाल ही में आयोजित कविता कृष्णमूर्ति संगीत संध्या, मालिनी अवस्थी नृत्य संध्या तथा राजस्थानी मांगणियार लोक गायकों की संगीत संध्या का उच्चस्तरीय सांस्कृतिक प्रदर्शन इसके तात्कालिक उदहारण हैं। 

** https://www.casadelaindia.org/

इस संस्था द्वारा स्पेन के वायादोलिद एवं माद्रीद शहरों में भारतीय संस्कृति से संबन्धित कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, योग एवं अध्यात्म की कक्षाएं चलाई जाती हैं, जिनमें भारतीय मूल के लोग तथा स्पेनिश जन अध्ययन करते हैं। इसके अलावा स्पेन की भूतपूर्व राजधानी वायादोलिद शहर में वायादोलिद विश्वविद्यालय में आईसीसीआर (भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद) की एक हिन्दी भाषा की चेयर स्थापित है, जहां मुख्यतः हिस्पानी लोग हिन्दी पढ़ते हैं। इस चेयर का कार्यकाल 2 वर्ष है,अतः शिक्षक प्रति दो वर्ष में बदल जाते हैं। वर्तमान में 2019 के पश्चात कोई हिन्दी शिक्षक नहीं आए हैं। 

स्पेन की वर्तमान राजधानी मद्रीद के कोम्प्लूतेंसे विश्वविद्यालय में कुछ वर्ष पूर्व तक हिन्दी का अध्यापन चला करता था, किन्तु कुछ वर्षों से वहाँ हिन्दी का कोई कोर्स नहीं दिया जा रहा है, मैंने उनसे संपर्क करके पता करने का प्रयास किया तो बताया गया कि विद्यार्थियों की अनुपलब्धता के कारण वर्तमान में वहाँ हिन्दी शिक्षण स्थगित किया गया है। भविष्य में यदि एक कक्षा चलाने लायक विद्यार्थी उपलब्ध हुये तो हिन्दी शिक्षण पुनः आरंभ किया जाएगा। 

¨हिन्दी गुरुकुल स्पेन¨ हिन्दी भाषा एवं संस्कृति को समर्पित एक अन्य प्रमुख संस्थान है। पिछले कुछ वर्षों में विदेशी मूल के विद्यार्थियों हेतु हिन्दी अध्ययन के लिए यह सर्वाधिक उपयुक्त संस्थान के रूप में उभरा है। हिन्दी दिवस के आयोजन, काव्य गोष्ठी, कथा गोष्ठी, साक्षात्कार, विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सहभागिता कर ¨हिन्दी गुरुकुल स्पेन¨ हिन्दी को समर्पित अनेक गतिविधियों द्वारा हिन्दी को एक नया स्थान एवं आयामप्रदान करने में सफल रहा है।  

भारतीय राजदूतवास द्वारा समय समय पर हिन्दी अध्ययन के निम्न समयावधि के पाठ्यक्रम  आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा कुछ भारतीय मूल के हिन्दी शिक्षक स्वतंत्र तौर पर हिन्दी शिक्षण कर रहे हैं। 

**http://www.casadelaindia.org/

 

स्पेन में हिन्दी सीखने में आने वाली कठिनाई  

आपके प्रवास स्थान में जिस भाषा में बात की जाती है, वह भाषा यदि आपकी मातृभाषा से ज़रा भी बहनापा न रखती हो तो सबसे पहली समस्या तो संवाद की आती है कि किस तरह वहाँ के मूल निवासियों सेसंवाद स्थापित हो? जब मैं स्पेन आई तो यही समस्या मेरे सामने भी आई थी। स्थानीय जनता स्पेनिश भाषा से अधिक कोई अन्य भाषा नहीं जानती थी और न ही किसी अन्य भाषा को सीखने के प्रति अतिउत्साहित थी। अतः स्पेनिश भाषा ज्ञान अर्जित करना मेरे लिए प्रथम कार्य था। और यही सलाह में आगे आने वाले हिन्दी अध्यापकों को देना चहुंगी कि आप जिस भूभाग में हिन्दी शिक्षण के लिए जाएँ, वहाँ की भाषा के साथ मित्रता करना न भूलें! दो अलग अलग जुबान में संवाद स्थापित करने हेतु कम से कम स्पेन में रहने वाले  हिन्दी शिक्षक को स्थानीय भाषा ज्ञान अर्थात स्पेनिश भाषा ज्ञान अत्यंत आवश्यक है। 

स्पेन में रहने वाले हिन्दी विद्यार्थियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती होती है एक श्रेष्ठ हिन्दी शिक्षक की तलाश। आधे अधूरे हिन्दी भाषा ज्ञान के साथ कुछ लोग हिन्दी पढ़ाने को तत्पर हो जाते हैं और वे विध्यार्थी को संतुष्ट नहीं कर पाते हैं। इस वजह से हिन्दी के अनेक शिक्षकों को आजमाते हुये कई बार विदेशी विद्यार्थी हताश होकर हिन्दी भाषा अध्ययन का त्याग कर देते हैं। हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाये अथवा रोमन लिपि में? लिपि के अंतर को भी हिन्दी सीखने हेतु एक बड़ी चुनौती माना जा सकता है।  

इसके बाद बड़ी समस्या है एक निश्चित पाठ्यक्रम की उपलब्धता! क्योंकि अधिकतर शिक्षक गण स्वयं हिन्दी भाषा और व्याकरण से पूर्ण तौर पर परिचित नहीं होते एवं न ही वे योग्य शिक्षा प्राप्त अध्यापक होते हैं,अतः उनके पास हिन्दी का कोई सुनिश्चित पाठ्यक्रम भी उपलब्ध नहीं होता है, और यह एक दूसरा प्रमुख कारण है कि विद्यार्थी हिन्दी से दूरी बनाना आरंभ कर देते हैं। 

स्पेन के हिन्दी विद्यार्थियों के लिए एक अन्य मुख्य समस्या है अत्यधिक महंगे दाम में मिलने वाली हिन्दी की प्राइवेट कक्षाएं। यदि आपको किसी वजह से स्पेन में हिन्दी अध्ययन प्राइवेट कक्षा के माध्यम से करना है तो निश्चित तौर पर आपको वे कक्षाएँ बेहद महंगी पड़ेंगी क्योंकि कक्षा का दाम प्रति घंटे की दर से निश्चित किया जाता है तथा उपलब्ध स्थानीय हिन्दी शिक्षक आपसे आने जाने के समय का भी पैसा लेते हैं जो कि आधे घंटे से लेकर दो घंटे तक का समय हो सकता है। कई विद्यार्थी इस धन व्यय के कारण हिन्दी भाषा अध्ययन से मुंह मोड़ लेते हैं।

एक सबसे बड़ा सवाल जो मुंह बाए खड़ा रहता है, वह है कि आप स्पेन में हिन्दी भाषा सीख भी लें तो उसका प्रयोग कहाँ कर सकते हैं? हिन्दी भाषा सीखने पर बड़ी धनराशि व्यय करने के पश्चात हिन्दी भाषा द्वारा धनोपार्जन हेतु कोई विशेष सुविधा उपलब्ध नहीं है, तो फिर क्यों परिश्रम और आर्थिक व्यय किए जाएँ? आज के युग में शिक्षा के सभी रास्ते धनोपार्जन की तरफ खुलते हैं, अतः हिन्दी भाषा को भी धन अर्जित करने हेतु सक्षम होना होगा। हम आशान्वित हैं कि संभवतः भविष्य में इन प्रश्नों को हल किया जाये और हिन्दी भाषा द्वारा धनोपार्जन की उचित दिशा मिल सके!   

स्पेन में हिन्दी अध्ययन के लिए उपलब्ध पुस्तकें 

रुपेर्ट स्नेल द्वारा हिन्दी सीखने हेतु लिखित पुस्तक आरंभिक हिन्दी अध्ययन एक सर्वाधिक प्रचलित पुस्तक है जो कि हिन्दी भाषा के लगभग सभी विद्यार्थियों के लिए संजीवनी का काम करती है। इस पुस्तक का अनुवाद लगभग सभी यूरोपीय भाषाओं में उपलब्ध है। ऑडियो सी डी के साथ आने वाली यह पुस्तक आपको वर्णमाला के उच्चारण से लेकर कठिन व्याकरण एवं मुहावरों तक को सिखाने का दम  रखती है। इस पुस्तक में आप हिन्दी के वाक्यांश देवनागरी तथा रोमन, दोनों ही लिपि में पढ़ सकते हैं। तथा प्रत्येक अध्याय के पश्चात आप एक छोटे से प्रश्न पत्र द्वारा स्व मूल्यांकन कर सकते हैं। 

इसके अलावा वायादोलिद विश्वविध्यालय द्वारा प्रकाशित पुस्तक ¨सरल हिन्दी¨ हिन्दी सीखने के लिए एक अत्यंत उपयोगी पुस्तक है। इस पुस्तक में वर्णमाला से आरंभ कर संज्ञा, सर्वनाम, क्रिया इत्यादि की अनेक सारिणियाँ बनाकर हिन्दी को सरल रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिस से विद्यार्थी हिन्दी को क्लिष्ट भाषा न समझें और इसकी तरफ सहज रुचि विकसित हो सके। अनेक उदाहरण प्रस्तुत करके व्याकरण की उचित समीक्षा की गई है। इस पुस्तक के लेखक द्वय हैं – प्रोफेसर विजयकुमारन सी पी वी तथा उनके शिष्य श्री जीसस आर्रिबास लाज़ारो। 

स्पेनिश एवं हिन्दी भाषा के कुछ अंतर / विरोधाभास 

यदि आप हिन्दी भाषी हैं और आपको स्पेनिश मे सबसे बड़ी दुविधा पूछी जाये तो वह है शब्दों के लिंग निर्धारण में आने वाली समस्या! अब आप पूछेंगे, वह कैसे? तो मैं आपको उदाहरण सहित समझाती हूँ। जैसे हिन्दी में फूल/पुष्प/कुसुम पुल्लिंग शब्द है, किन्तु स्पेनिश में ¨ला फ्लोर¨ स्त्रीलिंग हो जाता है। जैसे कलम/पेन हिन्दी भाषा में स्त्रीलिंग है किन्तु हिस्पानी भाषा में ¨एल बोलीग्राफ़ो¨ पुल्लिंग हो जाता है। तो इस तरह कई शब्दों के साथ यह शब्दों के लिंग निर्धारण की समस्या आती है। स्पष्ट है कि हिस्पानी लोगों को भी हिन्दी में बात करते हुये यह समस्या सामने आती है। 

दूसरा अंतर है वाक्य विन्यास का अंतर। हिन्दी भाषा में अधिकांश वाक्य किसी क्रिया पर समाप्त होते हैं,जैसे -राहुल फुटबाल खेलता है। जबकि स्पेनिश भाषा में अधिकांश वाक्य किसी संज्ञा के साथ समाप्त होते हैं। 

तीसरा अंतर है सर्वनाम और क्रियाएँ! हिन्दी भाषा में हमारे पास सर्वनाम प्रचुरता में हैं, जैसे मैं, तुम, तू, वे ,हम, उन्हे, आप इत्यादि। स्पेनिश भाषा में प्रत्येक सर्वनाम के साथ क्रिया रूप असंख्य हैं, जैसे किसी भी क्रिया का वर्तमान काल, भूतकाल, भविष्य काल और फिर इनके तात्कालिक काल रूप, एवं अन्य अनेक कालों में रूप, जो कि प्रत्येक सर्वनाम के साथ बदल जाते हैं। मोटे तौर पर बताऊँ तो हिस्पानी भाषा में एक क्रिया शब्द हेतु लगभग 86 रूप बनाए जा सकते हैं अथवा एक क्रिया शब्द को 86 तरीके से अलग अलग काल में गढ़ा/बोला जा सकता है। एक हिन्दी भाषी के लिए एकाएक इतने सारे क्रिया रूप याद करना कठिन अवश्य जान पड़ता है किन्तु थोड़े से श्रम से ये सभी रूप स्मरण किए जा सकते हैं।   

हिन्दी भाषा में एक बेहद नटखट प्रकार की चाल है, जो कि हिस्पानी लोगों के लिए संकट का सामना करने समान है। वो है कारक का प्रयोग, जैसे,-यह मेरा कमरा है। इस कमरे में कौन है?- इन दोनों वाक्यों में –कमरा- एकवचन है किन्तु दूसरे वाक्य में अधिकरण कारक के प्रयोग से (-में) कमरा अपने बहुवचन रूप ¨कमरे¨ की तरह बर्ताव करता है, और यह समझ पाना स्पेनिश लोगों हेतु एक कठिन कार्य है कि जब एकवचन ही है तो कमरा ही क्यों नहीं कहा जाता? हालांकि हिन्दी भाषा के उचित अध्ययन से वे इसे समझ पाने में सफल रहते हैं।   

स्पेनिश एवं हिन्दी की कुछ समानताएँ 

बहुत समय पहले की बात है, लगभग 2008 के आस पास की, एक हिस्पानी भाषा की प्राध्यापिका से मेरी बात हो रही थी। उन्होने जो कहा उसे सुनकर तब मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई थी, वही बात आज मैं आपको बताना चाहती हूँ। उन्होने कहा कि जब वे हिस्पानी भाषा की विश्वविद्यालयी स्तर की अधिकृत शिक्षा ग्रहण कर रहीं थीं, तब उन्हें पढ़ाया गया था कि यूरोपीय मूल की लातिन भाषा का उद्गम संस्कृत भाषा से माना जाता है, जो कि अधिकतर यूरोपीय भाषाओं की जननी मानी जाती है। यदि हम इस तथ्य को ध्यान में रखकर सोचें तो भारत की हिन्दी और यूरोपीय भाषाएँ आपस में गहरा संबंध रखती हैं। और इस नाते कुछ न कुछ समानता इन भाषाओं में देखने को मिलें तो कोई आश्चर्य न होगा! 

मैं केवल हिस्पानी और हिन्दी की बात करूँ तो एक बहुत बड़ी समानता इन दोनों भाषाओं में यह है कि दोनों ही भाषाएँ जिस तरह लिखी जाती हैं ठीक उसी तरह उच्चारित भी की जाती हैं, अर्थात जो कुछ जैसा लिखा गया है,वह बिलकुल उसी तरह बोला जाएगा। न ही कोई अक्षर उच्चारण में कम होगा और न ही लिखने में वर्तनी में कोई अधिक अक्षर होगा, जैसा कि अन्य कई यूरोपीय भाषाओं में देखने को मिलता है। उच्चारण सरल होने से सीखने की जटिलता और सीखने में लगा समय काफी हद तक कम हो जाता है। 

स्पेनिश भाषा की यह विशेषता इसे अन्य यूरोपीय भाषाओं से काफी हद तक विशेष कलेवर भी देती है और विश्व के भाषा प्रेमियों को इसे सीखने के लिए लालायित भी करती है। क्या यही लालसा हिन्दी सीखने के प्रति भी उद्घोषित हो सकती है?

 

स्पेन में हिन्दी लेखक 

यदि आप यह सोचते हैं कि स्पेन में हिन्दी लेखकों की कमी है तो आप सर्वथा भ्रम में जी रहे हैं। वर्ष 2015 तक मैं बड़े जतन से हिन्दी लेखकों की खोज कर रही थी, किन्तु स्पेन की धरती पर कहीं कोई हिन्दी लेखक नहीं मिल रहा था। तलाश करते करते साल 2018 के बाद ही मैं एक दो लेखकों को खोज पाई थी। फिर साल 2019 में विश्व रंग के लिए तैयारी करते समय कुछ और लेखक मिलते गए और अब मैं गर्व से कह सकती हूँ कि स्पेन में भी कई हिन्दी लेखक हैं जो नियमित हिन्दी लेखन और हिन्दी से जुड़े हुये हैं। इनमें से अधिकांश हिन्दी लेखक मद्रीद और बार्सेलोना में हैं किन्तु कुछ अन्य शहरों में भी हिन्दी लेखक हैं, जो वर्तमान में स्पेन में रहकर  गद्य और पद्य लिख रहे हैं। 

स्पेन में हिन्दी गोष्ठियाँ एवं अन्य हिन्दी गतिविधियाँ 

स्पेन में धार्मिक क्रिया कलापों में रत अधिकांश समूह अपने आयोजनों में हिन्दी भाषा में अपनी संस्कृति को प्रस्तुत करते रहते हैं। इनमें भजन संध्या,नृत्य नाटिका, धार्मिक ग्रन्थों से प्रवचन इत्यादि समाहित हैं। इसाओम एक जानी पहचानी स्वायत्तशासी गैर सरकारी संस्था है जिसने माद्रीद में गीता आश्रम की स्थापना द्वारा हिन्दी भाषी भारतीयों के लिए एक भवन उपलब्ध करवाया है जहां पर अधिकांश हिन्दू धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा अन्य जातिगत बने हुये समूहों (सिंधी, गुजराती,पंजाबी, बंगाली, मलयाली, तमिल)  द्वारा सामूहिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जिसमें अङ्ग्रेज़ी और स्पेनिश के साथ ही साथ हिन्दी भाषा भी उपस्थित रहती है। 

बॉलीवुड फिल्में स्पेन के विभिन्न सिनेमा घरों में देखने को मिल जाती हैं,जिनकी वास्तविक बोली हिन्दी ही रखी जाती है, और उपशीर्षक (सबटाइटल) स्पेनिश में लगाए जाते हैं, ताकि स्पेनिश लोग भी इन हिन्दी चलचित्रों का आनंद ले सकें। 

हिन्दी गुरुकुल स्पेन द्वारा समय समय पर हिन्दी भाषा में काव्य एवं कथा गोष्ठी अथवा साक्षात्कार आयोजित किए जाते रहते हैं। प्रत्येक वर्ष हिन्दी दिवस पर विविध सांस्कृतिक साहित्यिक प्रस्तुति प्रदर्शित की जाती हैं। 

भारतीय राजदूतावास द्वारा अधिकांश भारतीय पर्व और उत्सव का आयोजन किया जाता है, जिसमें स्पेनिश के साथ हिन्दी भाषा की उपस्थिति भी सामान्य है। यहाँ भारतीय योग आसन की शिक्षा का प्रबंध हिन्दी भाषा में किया जाता है जिस से हिन्दी पढ़ने लिखने और बोलने वालों की संख्या बढ़े। 

अस्तु, इन सभी गतिविधियों के परिप्रेक्ष्य में मैं यह कह सकती हूँ कि यूरोप के दक्षिणी देश स्पेन में हिन्दी भाषा का भविष्य उज्ज्वल है। 

- पूजा अनिल 

Note - यह आलेख श्री जवाहर कर्नावट द्वारा संकलित एवं संपादित पुस्तक “विश्व में हिंदी” 2023 संस्करण में प्रकाशित हुआ है। 

गुरुवार, 16 अक्टूबर 2025

लोपामुद्रा - अजन्मी ब्रह्मवादिनी

 


लोपामुद्रा - अजन्मी ब्रह्मवादिनी 

वैदिक युग में नारी के भली भांति शिक्षित होने के साथ ही समाज में उनके समान अधिकार और पूर्ण  सम्मान के बारे में लगभग सभी वेद कहते हैं। यहाँ तक कि वेदों के निर्माण में भी महिलाओं का पुरुषों की तरह ही एक समान योगदान होने के बारे में उल्लेख मिलता है। हालाँकि, इसके साथ ही समाज में स्त्री की एक सीमित भूमिका का भी संदर्भ मिलता है। हाँ, सभ्यताओं के दो विपरीत किनारों पर खड़ी स्त्री समाज के लिए सदैव उपयोगी रही है, इसमें कोई संदेह नहीं। उपनिषदों, शास्त्रों तथा पुराणों में नारी को एक सूक्ष्म एवं  तेजस्वी शक्ति के रूप में उपासना किये जाने का संदर्भ मिलता है। इन शास्त्रों में से कुछ प्रमुख नाम हैं: देवी उपनिषद, देवी महात्म्य एवं देवी भागवत पुराण।  इसके अलावा ऋग्वेद का देवी सूक्त कहता है कि ब्रह्मांड के सृजन के मूल में स्त्री शक्ति है तथा शाश्वत, अविनाशी स्वरुप में यह शक्ति सर्वत्र व्याप्त है, स्वयं ब्रह्म, आत्म एवं अनुभूति में भी इसी स्त्री तत्त्व की उपस्थिति कही गई है।  

 

  वैदिक स्त्रियों में कुछ अत्यंत प्रसिद्ध एवं महत्वपूर्ण नाम हैं - घोषा, मैत्रेयी, गार्गी। ये सभी तपस्विनी, ब्रह्मवादिनी, दर्शन शास्त्री, संत, कल्याणकारी तथा अत्यंत विदुषी स्त्रियों में गिनी जाती हैं। इन्होने अपनी प्रखर बुद्धि से वेद, पुराण एवं उपनिषद रचना में भी सहयोग दिया। इन्हीं नामों में एक नाम है लोपामुद्रा का। 

 

पू॒र्वीर॒हं श॒रद॑: शश्रमा॒णा दो॒षा वस्तो॑रु॒षसो॑ ज॒रय॑न्तीः। 

मि॒नाति॒ श्रियं॑ जरि॒मा त॒नूना॒मप्यू॒ नु पत्नी॒र्वृष॑णो जगम्युः ॥ १ ॥ ऋग्वेद 1.179.1 

 भावार्थ:

 जैसे बाल्यावस्था को लेकर विदुषी स्त्रियों ने प्रतिदिन प्रभात समय से घर के कार्य और पति की सेवा आदि कर्म किये हैं, वैसे किया है ब्रह्मचर्य जिन्होंने, उन स्त्री-पुरुषों को समस्त कार्यों का अनुष्ठान करना चाहिये॥ (स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद, संदर्भ वेद डॉट कॉम - https://xn--j2b3a4c.com/rigveda/1/179/1) 

 

 लोपामुद्रा ने ऋग्वेद में उपरोक्त सूक्त एवं गृहस्थ जीवन के बारे में कुछ अन्य सूत्र लिखे हैं। इन सूत्रों में रति कर्म एवं गृहस्थ पुरुष के अपनी पत्नी के प्रति कर्तव्य के बारे में उल्लेख आता है। लोपामुद्रा की कहानी जानने एवं उसके द्वारा लिखित ऋग्वेद के सूत्रों का मर्म जानने के बारे में  मुझे जिज्ञासा हुई तो कुछ छानबीन करने के पश्चात् जो कहानी हासिल हुई, वह कहानी और कुछ प्रश्न , कुछ अवलोकन लेकर मैंने यह आलेख लिखने का प्रयास किया है। 

लोपामुद्रा को  प्राचीन भारतीय वैदिक साहित्य में तत्वज्ञानी के रूप में वर्णित किया गया है।  इन्हें अन्य नामों से भी जाना जाता है, कावेरी, कौशितकी एवं वरप्रदा। एक महत्वपूर्ण बात जो उनके बारे में कही जाती है कि वे एक प्रसिद्ध ब्रह्मवादिनी के रूप में पहचानी जाती हैं। आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूंगी कि ब्रह्मवादिनी उपाधि उस स्त्री को दी जाती है जो इस विश्व के रहस्य, तत्वज्ञान एवं ब्रह्म सत्य की तलाश में सम्पूर्ण प्रयास तथा परिश्रम करके ज्ञान प्राप्त करती है तथा उस प्राप्त ज्ञान के कारण वेद व्याख्याता भी कही जाती है। 

 

शास्त्रों में जिन तीन महत्वपूर्ण ग्रंथों में लोपामुद्रा का आख्यान आता है, वे हैं: ऋग्वेद, महाभारत का वनपर्व तथा गिरिधर रामायण। 

  

कहा जाता है कि ऋषि अगस्त्य (सप्तऋषियों में से एक) अपने पुरखों की शांति हेतु श्रेष्ठ संतान पाने की इच्छा से अपने लिए एक सर्वगुण संपन्न पत्नी चाहते थे। अतः उन्होंने संसार के विभिन्न प्राणियों के सर्वश्रेष्ठ अंग अथवा गुण लेकर एक बालिका का सृजन किया। इस सृजन से प्राणियों के विशेष गुणों अथवा अंगों का ह्रास होने के कारण ऋषि द्वारा सृजित कन्या का नामकरण लोपामुद्रा हुआ। बाद में ऋषि अगस्त्य ने उसे विदर्भ देश के राजा को सौंप दिया, जो कि संतान प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या कर रहे थे। राजा ने उस नन्ही शिशु को अपनी पुत्री मानकर उसका पालन पोषण किया।  जब वह विदर्भ राजकुमारी विवाह योग्य हो गई तब ऋषि अगस्त्य राजा के पास उस कन्या से विवाह की कामना से पहुंचे और लोपामुद्रा द्वारा विवाह की स्वीकृति मिलने से वह उनकी पत्नी बन गई। 

विवाहोपरांत लोपामुद्रा ने राजमहल तथा राजसी वस्त्राभूषणों का त्याग कर दिया और ऋषितुल्य वस्त्रों में अपने पति के आश्रम में रहने चली गई।  किन्तु जल्दी ही वह अपने पति के संयमित व्यवहार एवं तपस्या से उकता गई और इस उकताहट को उन्होंने ऋग्वेद में स्वयं के प्रति ध्यान दिए जाने तथा पत्नी को प्रेम दिए जाने के बारे में लिखा। यह छंद देख कर ऋषि को अपने पति धर्म निभाने का ज्ञान हुआ और तब उन्होंने अपनी पत्नी पर ध्यान देकर गृहस्थ धर्म निभाया। यह साडी कथा महाभारत के अरण्य पर्व में वर्णित है। 

 

ऋग्वेद में लोपामुद्रा ने श्रेष्ठ संतान पाने हेतु दम्पति के आदर्श परस्पर व्यवहार को निर्देशित करते हुए सूक्त लिखे हैं। इन्हें दंपत्ति को समर्पित सूक्तों की श्रेणी में रखा गया है। जैसे: 

 अ॒गस्त्य॒: खन॑मानः ख॒नित्रै॑: प्र॒जामप॑त्यं॒ बल॑मि॒च्छमा॑नः। उ॒भौ वर्णा॒वृषि॑रु॒ग्रः पु॑पोष स॒त्या दे॒वेष्वा॒शिषो॑ जगाम ॥

(ऋग्वेद » मण्डल:1» सूक्त:179» मन्त्र:6 | अष्टक:2» अध्याय:4» वर्ग:22» मन्त्र:6) 

भावार्थ-

 

 जैसे कृषि करनेवाले अच्छे खेतों में उत्तम बीजों को बोय कर फलवान् होते हैं और जैसे धार्मिक विद्वान् जन सत्य कामों को प्राप्त होते हैं वैसे ब्रह्मचर्य से युवावस्था को प्राप्त होकर अपनी इच्छा से विवाह करें वे अच्छे खेत में उत्तम बीज सम्बन्धी के समान फलवान् होते हैं ॥ ६ ॥ (स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद) 

 

लोपामुद्रा के बारे में पढ़ते हुए यह ज्ञात होता है कि - 

1 - पूर्व में ऋषियों के पास संभवतः कोई ऐसी विधि थी अथवा कोई ऐसा ज्ञान था जिस से बिना गर्भ धारण के संतानोत्पत्ति संभव थी।  जैसे इस आख्यान में ऋषि अगस्त्य इस संसार से विभिन्न अवयव एकत्र करके एक सुंदरतम विदुषी कन्या की कल्पना करते हुए एक पिंड बना कर उसे कन्या रूप में परिवर्तित कर देते हैं। यदि इस कहानी को केवल एक कपोल कल्पना भी माना जाए तो लोपामुद्रा के जन्म लेने का अन्यत्र कहीं सन्दर्भ मिलना चाहिए, जो कि अब तक कहीं नहीं मिलता।  

 

2  - जब ऋषि उस से विवाह का प्रस्ताव लेकर आते हैं तब विदर्भराज अपनी पुत्री का विवाह एक ऋषि से नहीं करवाना चाहते और वे अपनी पत्नी के सामने इस विषय पर वार्तालाप करते हैं। साथ ही राजा को ऋषि द्वारा शापित होने का भी भय है। इस दुविधा के समय में अपने पिता को आश्वस्त करते हुए लोपामुद्रा ऋषि से अपने विवाह का निर्णय स्वयं ही लेती है। राजा द्वारा अपनी पुत्री का यह निर्णय स्वीकार्य होता है, जिसका अर्थ यह हुआ कि उस काल में स्त्री का स्वेच्छा से विवाह करना अत्यंत सहज सामाजिक प्रक्रिया के अंतर्गत होना चाहिए। जहाँ स्त्री के चुनाव को सहमति दिए जाने में हिचकिचाहट नहीं होती होगी। यदि ऐसा न होता तो लोपामुद्रा के निर्णय का विरोध किया जाता तथा उसे पिता द्वारा चुने हुए वर से विवाह के लिए बलपूर्वक राजी किया जाता। इसी अंश में राजा अपनी पत्नी से विमर्श करते हैं, जो कि इस बात का सूचक है कि उस काल में पत्नी का उचित मान हुआ करता था और अपनी पत्नी से विचार विमर्श करने में स्वयं राजा भी आगे बढ़कर अपनी दुविधा के बारे में बात करते थे। 

 

3 - विवाह के पश्चात आश्रम में जब ऋषि तपस्या में लीन थे और लोपामुद्रा ने स्वयं को अकेला पाकर पति के साथ की चाह में कुछ सूक्त रचे तो ऋषि ने न केवल उन सूत्रों को वेद वचन की भांति सम्मान दिया अपितु उन सूत्रों को वेदों में सम्मिलित भी किया। यही नहीं, पत्नी की इच्छा का सम्मान करते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए ऋषि कर्म से मुक्त होकर पति धर्म निभाते हुए एक गृहस्थ के समान पत्नी समागम भी किया। और जिस श्रेष्ठ पुत्र की चाह में उन्होंने यह विवाह किया था, इस से उन्हें वह पुत्र भी प्राप्त हुआ। आख्यान के इस अंश से मैं यह समझती हूँ कि उस काल में एक स्त्री पति संसर्ग के लिए स्वयं प्रस्ताव रखने तथा पति को आकर्षित करने में झिझकती नहीं थी। सवाल यह है कि क्या उस समय में देह भोग एक छिपा कर रखने का विषय रहा होगा? यह भी संभव है कि लोपामुद्रा एक राजा के पास राजसी शिक्षा से पाली गई, अतः उसमें एक भयमुक्त स्वाभाविक त्वरा रही हो, उसी कारण उसमें अपनी बात कहने का पूर्ण आत्मविश्वास हो! दूसरे, ऋषि द्वारा अत्यंत बुद्धिमती स्त्री के रूप में उसका सृजन किया गया, जिसकी वजह से अपने सृजन के प्रति एवं उसकी आत्मविश्वास और ज्ञान से भरपूर बात के प्रति ऋषि आनंदित अनुभव करते हों एवं सहज ही उसे संतुष्ट करने को तत्पर हुए हों! 

 

इन परिस्थितियों का उस काल में जो भी कारण रहा हो, यह तो निश्चित ही सत्य है कि लोपामुद्रा अत्यंत रूपमती और ज्ञानवती स्त्री थी। इस आख्यान का अंत करने से पहले मैं लोपामुद्रा के नदी बन जाने की कहानी भी बताना चाहूंगी। कहा जाता है कि किसी कारण रुष्ट होकर  विष्णु भगवान ने लोपामुद्रा को श्राप दिया कि नदी बन जाओ। किन्तु ऋषि को लोपामुद्रा से दूर होना कष्टकर प्रतीत हुआ। अतः उन्होंने अपने कमंडल में नदी रूपी लोपामुद्रा को सहेज लिया। एक वेगवान नदी की लिए एक छोटे से कमंडल में बंद होकर रहना कठिन था।  यह कठिनाई दूर करने के लिए श्री गणेश एक कौवे के रूप में आये और तपस्या करते ऋषि के पास ही रखे कमंडल को गिरा दिया। इस प्रकार लोपामुद्रा कमंडल में से नदी की तरह बह निकली और कावेरी नदी के नाम से पहचानी गई। 

 

एक अजन्मी अद्भुत कन्या को किसी साधारण रूप से जन्मे व्यक्ति की भांति मृत्यु नहीं प्राप्त हो सकती थी, अतः उसका नदी बन कर जग कल्याणकारी रूप में परिवर्तित हो जाना ही श्रेयस्कर! 

पूजा अनिल 

 Note- यह आलेख साहित्यनामा पत्रिका के फरवरी 2024 अंक में प्रकाशित हुआ। 

गुरुवार, 11 सितंबर 2025

व्यंग्य- कसूरवार होते हैं विचार



मई 2023 में आ. रामस्वरूप दीक्षित जी ने एक व्यंग्य भेजने के लिए कहा था। फिर इस पर कभी बात नहीं हुई। अचानक कल उनका संदेश आया इन दो पृष्ठों के चित्रों के साथ। दोस्तों, सदीनामा पत्रिका में मेरा एक व्यंग्य प्रकाशित हुआ है। आप सभी के लिए इसे यहाँ साझा कर रही हूँ। 

श्री रामस्वरूप  दीक्षित जी का आभार व्यक्त करती हूँ। 


शनिवार, 6 सितंबर 2025

वह क्रिस्तीना है?


मैं शाम को वॉक करके घर लौट रही थी। रास्ते में कुछ बच्चे मिले, अपने पेरेंटस के साथ जाते हुए। उनके चेहरे रंगे हुए थे और आँखों पर मास्क लगा हुआ था। वे बेहद खुश थे, माँ को कोई घटना बताते हुए। उनकी माँ भी बतियाती जा रही थी। बस यह दृश्य देखकर मेरे चेहरे पर भी मुस्कान छा गई। मुझे मुस्कुराते देख माँ लोग भी मेरी तरफ मुस्कुरा दिए। बच्चे मुझे यूँ भी बहुत अच्छे लगते हैं। फिर स्पेनिश बच्चे तो एकदम गोरे गोरे रूई के समान गुलाबी गुलगुले लगते हैं। 


रोड क्रॉस करने लगी तो दूसरी तरफ़ तीन चार लोग अपने नन्हे मुन्नों के साथ खड़े थे। सब बच्चों के चेहरे डिज़ाइनर रंग बिरंगे रंगे हुए, हाथों में लॉलीपॉप और ढेर सारी खुशी की चमक! शायद वहीं पास के सेलिब्रेशन सेंटर में किसी ने अपने बच्चे का जन्मदिन मनाया होगा। और उस समय बच्चे सेंटर से बाहर निकल रहे थे। 


जैसे ही ज़ेब्रा क्रॉसिंग पार किया उनमें से एक सफेद फ्रॉक पहने हुए बच्ची ने मुझे देख कर तुरंत दौड़ लगाई और ज़ोर से चिल्लाई “क्रिसतीनाऽऽऽऽ!!!” और तत्क्षण आकर मुझसे लिपट गई। अत्यंत खुशी से झूमने लगी। 

मैं तो वैसे ही इतने प्यारे बच्चों को देखकर बड़ी प्रसन्नता से मुस्कुराते हुए जा रही थी। उसके इस अपनत्व भरे आलिंगन से जैसे हज़ारों वॉट की चमक आ गई मुझमें। 

मैंने उस बच्ची को प्यार से होला! कहा, पूछा कि वह कैसी है और मैं उसी मिठास से हँसते हुए आगे निकलने लगी। लेकिन वह बच्ची बेहद उत्साहित होकर अपने पैरेंट्स से दोहरा कर कहने लगी कि देखो क्रिस्तीना है! वे सब लोग मुझे देख रहे थे। मैंने हँस कर हाथ हिला कर उन्हें भी अभिवादन कर आगे बढ़ गई। 


मेरे पीछे वे तीनों बच्चे मुझे बार बार आवाज़ देकर बुलाते रहे- क्रिस्तीनाऽऽऽऽऽऽ!! “क्रिस्तीनाऽऽऽऽऽऽऽ!” इतनी प्यारी आवाज़ें सुनकर सड़क के दूसरे छोर से मुझे उन्हें मुड़ कर देखे बिना आगे बढ़ा ही नहीं गया। मैं ठिठकी, दूर से ही हाथ हिलाकर उन्हें बाय किया। उन्होंने भी मुझे हाथ हिलाकर बाय किया और फिर मैं अपने गंतव्य की ओर चल पड़ी। उनके पैरेंट्स अभी भी मुझे जाते हुए देख रहे थे। 


शायद उनकी किसी अतिप्रिय अध्यापिका का नाम क्रिस्तीना होगा, जो कि बच्चों की मनपसंद टीचर होगी! अनजाने ही उसके हिस्से का प्यार मुझे मिल गया। बच्चे ऐसी ऊर्जा का स्रोत होते हैं कि जो निष्प्राण में भी तत्काल प्राण फूंक देते हैं, बस उसी ऊर्जा के आलिंगन के बाद से मन अधिक खिला खिला सा है। शिक्षक दिवस पर इस तरह उपहार स्वरूप बच्चों का साथ मिलना सबसे बड़ा उपहार हो गया।  

-पूजा अनिल