सुबह की पहली किरण को
सबसे पहले पकड़ लेने के मनसूबे लिये
पर्वतों के कदम छोटे करने में व्यस्त हो रही हूँ .....
तितलियों के पंखों को
उन किरणों की चमक से
रोशन करने की चाहत लिये
बगीचे के फूलों को अपनी बातों से फुसला रही हूँ.....
और इस चमक से
नूरानी हुये मेरे चेहरे पर अठखेलियाँ करती हंसी,
कहीं ठहरने की हसरत लिये
किरणों, फूलों और तितलियों संग
कुछ कुछ आवारापन कर रही है.
Sunday, December 5, 2010
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